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हवा के साथ पानी भी हो रहा निर्मल

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फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला
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फैक्टरियां बंद होने से खतरनाक रसायन के गिरने पर लगा विराम, शुद्ध हो रही रामगंगा
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प्रदूषण विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, 24 हजार केएलडी कम हुआ प्रदूषण, तीन माह बाद दिखाई देगा असर

बरेली। जनवरी में प्रदूषण विभाग की ओर से जारी सालाना रिपोर्ट में रामगंगा का पानी नहाने लायक भी नहीं होने का दावा किया था, मगर लॉकडाउन के बाद मार्च के आखिरी हफ्ते भर में रामगंगा में गिरने वाले नालों के पानी का सैंपल जांचा गया तो आंकड़े चौंकाने वाले मिले। 117.28 एमएलडी गिर रहे प्रदूषित जल में करीब 24 हजार केएलडी रामगंगा में प्रदूषण कम होने का दावा किया गया है। अफसरों का कहना है कि अगर लॉकडाउन करीब तीन माह और चले तो काफी हद तक रामगंगा निर्मल हो जाएगी। साथ ही मर रहे जलीय जंतुओं की संख्या में भी तेजी से कमी आएगी।
प्रदूषण विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, रामगंगा के प्रदूषित होने की मुख्य वजह घरों से निकला सीवरेज और फैक्टरियों से निकलने वाले खतरनाक केमिकल का बगैर ट्रीटमेंट किए नदियों में गिरना है। नगर निगम को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए कई बार विभाग ने पत्र लिखा और नोटिस भी जारी किए, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। वहीं, रामगंगा में सीधे गिर रहे नालों में फैक्ट्रियां से निकला खतरनाक केमिकल भी फेंका जा रहा है, जिसके चलते रामगंगा को प्रदूषण विभाग की ओर से निर्धारित पांच ग्रुप में से ग्रुप डी में दर्ज किया गया है। मगर लॉकडाउन के चलते फैक्ट्रियां बंद हैं और खतरनाक केमिकल पिछले करीब दो हफ्तों से नहीं गिर रहे। इसके चलते रामगंगा में गिर रहे नालों के खतरनाक केमिकल में करीब 24 हजार केएलडी यानी प्रतिदिन 24 हजार किलोलीटर खतरनाक रसायन नहीं पहुंच रहे हैं।

प्रदूषण का स्तर बढ़ने से जलीय जंतु खतरे में

ग्रुप डी का अर्थ है कि पानी में रह रहे जलीय जंतुओं की संख्या कम होने के बाबत उनके बचाव के लिए उचित प्रयास किया जाना। यानी प्रदूषण का स्तर बढ़ने से जलीय जंतुओं को खतरा है। इससे पानी कितना विषैला हो चुका है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
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फैक्ट्रियों से प्रतिदिन निकलने वाला प्रदूषित पानी
परसाखेड़ा में दो, मीरगंज में एक, फरीदपुर में दो, आंवला में एक, बहेड़ी में तीन, सेमीखेड़ा में एक, मोहनपुर ठिरिया में दो, नवाबगंज में एक, सीबीगंज में दो फैक्ट्रियां हैं। इसमें से सेमीखेड़ा स्थित फैक्ट्री बंद चल रही है। शेष गन्ना, डिसलेरी, मिल्क स्लॉटर हाउस, कागज व अन्य निर्माण करती हैं। प्रदूषण विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक इन फैक्ट्रियों से प्रतिदिन 24 केएलडी प्रदूषित पानी निकलता है। फैक्ट्री संचालकों के मुताबिक ईटीपी यानी इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट से शोधित होने के बाद ही पानी को नकटिया, शंखा, देवरनिया, चौबारी आदि नालों में गिरता है।

खतरनाक रसायन युक्त पानी कागजों में ट्रीट

फैक्ट्री संचालक भले ही ईटीपी के जरिए पानी को शोधित कर रामगंगा में गिराने का दावा कर रहे हों, मगर हकीकत इससे इतर है। सूत्रों के मुताबिक प्रदूषित पानी कागजों पर ही शोधित हो रहा है। पिछले वर्षों में कई बार सजग नागरिकों की शिकायत पर जांच हुई तो फैक्ट्रियों का रसायनयुक्त काला पानी रामगंगा में गिरता मिला था। इस पर नोटिस भी जारी हुए, मगर बाद में यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। प्रदूषण विभाग भी सिर्फ मॉनीटरिंग की खानापूर्ति कर रहा है।
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घरों से निकले सीवरेज का ट्रीटमेंट जरूरी
प्रदूषण विभाग के अफसरों का मानना है कि जिले में करीब 19 फैक्ट्रियां संचालित हैं। इनसे रोजाना 24 हजार केएलडी प्रदूषित पानी निकलता है। यह आंकड़ा शहर की करीब दस लाख आबादी से निकलने वाले सीवरेज से कई गुना कम है। रिपोर्ट के मुताबिक घरों से तकरीबन 117 एमएलडी प्रतिदिन प्रदूषित पानी निकलता है, जो बगैर ट्रीटमेंट सीधे रामगंगा में नगर निगम की ओर से गिराया जा रहा है, जो कि प्रदूषण का बड़ा कारणहै। उन्होंने इस प्रदूषण को कम करने के लिए नगन निगम को भी जल्द ट्रीटमेंट प्लांट यानी एसटीपी लगाने को कहा है।

फैक्ट्रियों समेत तमाम अन्य कल कारखानों से भी निकलने वाला प्रदूषित जल रामगंगा में गिरता है। संभव है कि लॉकडाउन की वजह से अब 24 हजार केएलडी प्रदूषित पानी कम गिर रहा है। इसका प्रभाव तभी दिखाई देगा जब घरों से निकलने वाला सीवरेज का भी ट्रीटमेंट किया जाए।
- रोहित कुमार, क्षेत्रीय अधिकारी, पीसीबी

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