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बदायूं में वोटर गाइड डेढ़ रुपये की तो बरेली में सवा पांच रुपये की क्यों

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बरेली। लोकसभा चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग के आदेश पर मतदाताओें को बांटने के लिए जो वोटर गाइड छपवाई गई थीं, उनके रेट में आसपास के जिलों के मुकाबले बड़े अंतर ने बरेली के जिला प्रशासन को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। यह भी कहा जा रहा है कि चुनाव के दौरान अधिकारियों ने कई गुना रेट पर सवा सात लाख वोटर गाइड छपवा तो लीं लेकिन उनका उपयोग सुनिश्चित करने का समय आया तो बेपरवाह हो गए। चुनाव के कई महीने बाद ये सवाल चर्चा में आने के बाद अफसर हैरान हैं और इसकी जांच कराने की तैयारी भी शुरू कर दी है।
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लोकसभा चुनाव से पहले भारत निर्वाचन आयोग ने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को मतदाताओं की सुविधा के लिए वोटर गाइड छपवाकर डोर टू डोर बंटवाने का आदेश दिया था। निर्देशों के मुताबिक हर परिवार को एक वोटर गाइड दी जानी थी। निर्वाचन आयोग के इस आदेश पर सभी जिलों में वोटर गाइड छपवाई गईं। बरेली जिले में वोटर गाइड के वितरण के लिए भी शहर की ही एक प्रिंटिंग प्रेस से 7.25 लाख कॉपी छापने का ऑर्डर दिया गया। हाल ही में शिकायतें हुईं कि बरेली में वोटर गाइड 5.27 के रेट में छपवाई गईं और इनके लिए प्रिंटिंग प्रेस को 38 लाख का भुगतान किया गया जबकि पड़ोस के बदायूं जिले में एक वोटर गाइड सिर्फ 1.55 रुपये प्रति कॉपी के हिसाब से छापी गई। इसी तरह पीलीभीत में भी सिर्फ 1.99 रुपये के रेट में वोटर गाइडों का प्रकाशन हुआ। इन शिकायतों के बाद अफसर इस बात पर हैरत में है कि एक ही टाइप की वोटर गाइड पीलीभीत और बदायूं जिलों की तुलना में बरेली लगभग ढाई-तीन गुना रेट में क्यों छपवाई गई। अब इस मामले की जांच कराने की तैयारी है।
जितनी बताईं उतनी छपवाई भी नहीं
सूत्रों के मुताबिक लोकसभा चुनाव के दौरान बरेली में तैनात रहे अधिकारियों ने रिकॉर्ड में 7.25 लाख वोटर गाइड छपवाने की बात तो दर्ज की लेकिन इतनी संख्या में उन्हें छपवाया नहीं था। बताया जा रहा है कि वोटर गाइड काफी कम संख्या में छपवाई गईं जबकि भुगतान पूरा कर दिया गया। अब इस मामले का खुलासा होने के बाद इस प्रक्रिया में शामिल रहे स्टाफ की बेचैनी बढ़ गई है।
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तीन सदस्यीय कमेटी थी जिम्मेदार
निर्वाचन सामग्री की खरीद-फरोख्त या प्रकाशन कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के निर्देशों के तहत तीन सदस्यीय कमेटी की थी। इसमें जिला निर्वाचन अधिकारी यानी जिलाधिकारी के साथ उप निर्वाचन अधिकारी यानी एडीएम प्रशासन और सहायक निर्वाचन अधिकारी शामिल थे। तत्कालीन एडीएम प्रशासन रामसेवक द्विवेदी का पिछले दिनों शाहजहांपुर तबादला हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक चुनाव के दौरान ज्यादातर भुगतान एडीएम प्रशासन रामसेवक द्विवेदी की देखरेख में ही हुए थे।
यह जानकारी थी वोटर गाइड में
मतदान कैसे किया जाए
एप का इस्तेमाल कैसे कर ऑनलाइन फार्म भरें और अपना बूथ देखें
लिस्ट में कोई अपडेट कराया है तो एप से कैसे पता करें
दिक्कतों के समाधान के लिए आयोग के टोल फ्री नंबरों की सूची

तो पुरानी मतदाता सूचियां भी रद्दी में
अफसरों के पास शिकायतें पहुंची हैं कि लोगों को निर्वाचन कार्यालय से 2019 से पहले मतदाता सूची का रिकार्ड नहीं मिल रहा है। एडीएम प्रशासन वीके सिंह भी हैरान हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है। सूत्र तो यह दावा कर रहे हैं कि निर्वाचन कार्यालय में रखी पुरानी सूचियां रद्दी में बेच दी गई हैं। बताते हैं कि चुनाव के बाद नई सूची को भी ट्रक पर रखवा दिया गया था लेकिन बाद में इसे दोबारा उतारकर दफ्तर में रखवा दिया गया। एडीएम प्रशासन का कहना है कि वैसे तो सूची ऑनलाइन है लेकिन निर्वाचन कार्यालय के पास मैनुअल रिकार्ड भी होना चाहिए। ऐसा क्यों हुआ है, इसके लिए निर्वाचन दफ्तर के बाबू देवेंद्र कुमार से स्पष्टीकरण मांगा गया है। देवेंद्र पर पहले से यह आरोप है कि चार्ज से हटने के बाद भी वह संबंधित लिपिक को रिकार्ड नहीं दे रहे हैं।

अपनी तैनाती के बाद मोहर्रम सहित कुछ व्यस्तता की वजह से निर्वाचन कार्यालय के कामों को नहीं देख सका हूं। निर्वाचन संबंधी जो भी गड़बड़ी सामने आ रही हैं, उन सभी की जांच कराई जाएगी। - वीके सिंह, एडीएम प्रशासन

तीन गुना रेट पर छपवाकर
भी नहीं बांटीं वोटर गाइड
बरेली। लोकसभा चुनाव के बाद निर्वाचन से जुड़े अफसरों पर जमकर मनमानी करने के आरोप लगे थे। कहा गया था कि वोटर गाइड, वोटर पर्ची के साथ विभिन्न फार्मों की छपाई के साथ मतगणना और मतदान के लिए हुए कई कामों के ठेकों में भी गोलमाल किया गया। इनकी शिकायतों को भी दबा दिया गया और कोई कार्रवाई नहीं की गई। पीलीभीत के एडीएम पर इस दौरान जरूर कार्रवाई हुई थी।
तत्कालीन उप जिला निर्वाचन अधिकारी यानी एडीएम प्रशासन आरएस द्विवेदी ने चुनाव के दौरान निर्वाचन संबंधी ठेकों और दूसरे कामों का निस्तारण किया था। मुख्य चुनाव अधिकारी उत्तर प्रदेश तक शिकायतें पहुुंचीं थीं कि जिले में ज्यादातर निर्वाचन कार्य बगैर ठेके और टेंडर के कराए जा रहे हैं। इस पर जांच भी हुई थी लेकिन ऊपर भ्रामक जवाब भेज दिया गया था। उप निर्वाचन अधिकारी ने तो यहां तक कह दिया था कि चुनाव में किसी टेंडर की जरूरत नहीं होती। इसी दौरान वोटर गाइड का हश्र भी खराब हुआ। बताया जा रहा है कि सिर्फ एक चौथाई वोटर गाइड छपवाई गईं और फिर उन्हें वोटरों को बांटने के बजाय जिला निर्वाचन कार्यालय में ही डंप कर दिया गया। बता दें कि कुछ दिनों पहले एडीएम प्रशासन को बरेली से ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू हुई तो एक पूर्व मंत्री की अड़ंगेबाजी के चलते उन्हें बमुश्किल शाहजहांपुर के लिए रिलीव किया जा सका। वह भी तब जब इस मामले शासन ने नोटिस जारी किया।
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