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Bareilly News: फसलों में रसायन का इस्तेमाल दे रहा जोड़ों का दर्द

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बरेली। फसलों में बेहिसाब इस्तेमाल हो रहे रासायनिक उर्वरक भी इंसानों के जोड़ों में दर्द का बड़ा कारण बन रहे हैं। आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान) के कैडराड विभाग के संयुक्त निदेशक रहे प्रो. आरएस चौहान ने दावा किया है कि ये उर्वरक खाद्य पदार्थों के जरिये मनुष्य के शरीर में पहुंचकर माइक्रोफेज की क्षमता को कम कर रहे हैं। कीटनाशक शरीर के जोड़ों में जमा होते रहते हैं। इससे लुब्रिकेंट तेजी से कम होता रहता है और तकलीफ बढ़ती जाती है।
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प्रो. आरएस चौहान वर्तमान में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक हैं। आईवीआरआई के एक कार्यक्रम में शामिल होने बरेली आए प्रो. चौहान ने शोध कार्य साझा करते हुए बताया कि गांव के बुजुर्ग कहते थे कि अब कोई भी चीज खाने पीने लायक नहीं रही। इसकी वजह तलाशने के लिए वर्ष 1990 में शोध कार्य शुरू किया। फसलों से बने उत्पाद और फिर उनकी ''जड़'' तक पहुंचे।
प्रो. चौहान के मुताबिक शोध में पता चला कि हरित क्रांति सेहत के समझौते पर हुई। केमिकल फर्टिलाइजर, पेस्टिसाइड का प्रयोग बढ़ा। इनकी हल्की सी मात्रा भी मानव और पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर कर देती है। लिहाजा, मौसम का परिवर्तन भी बीमार बना देता है।
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कीटनाशक निर्माताओं का दावा होता है कि कम मात्रा का शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। जिसे नो ऑर्ब्जवेबल एडवर्स इफेक्ट लेबल डोज कहा जाता है। लिहाजा, जिस मात्रा को दुष्प्रभाव से मुक्त माना, उसे चूहे और मुर्गियों पर प्रयोग किया। पता चला कि यह मात्रा भी इम्यून सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही है। इन पर प्राकृतिक, रासायनिक प्रभाव जांचें। प्राकृतिक, द्रवीय, कोशकीय इम्युनिटी प्रभावित मिली।

प्रो. चौहान के अनुसार कीटनाशक प्राकृतिक इम्युनिटी में मौजूद माइक्रोफेज को निष्प्रभावी करने लगते हैं। बताया कि यही माइक्रोफेज शरीर में प्रवेश करने वाले कीटाणु, बैक्टीरिया को खाकर कम करते हैं। जब माइक्रोफेज की क्षमता घट जाती है तो एंटीबॉयोटिक भी बेसअर होते हैं। यही वजह है कि बच्चे, बड़े, बुजुर्ग जो छिटपुट बीमारियों से पीड़ित होते हैं। एंटीबॉयोटिक से ठीक होकर फिर कुछ दिन बाद बीमार होते हैं।

बताया की माइक्रोफेज की कमी से बच्चों में होने वाला टीकाकरण भी रोगों से बचाव में पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाता। पैथोजन यानी कीटाणु जो शांत होते हैं वे भी बढ़ते रहते हैं, क्योंकि शरीर में जब टीकाकरण से एंटीबॉडी बनाने की क्षमता ही कम थी यानी ताकत ही नहीं थी तो वह भी निष्प्रभावी हो जाता है। एचआईवी, इबोला, कोरोना की भयावहता की वजह यही है। ज्यादा दवाएं भी शरीर को कमजोर बनाती हैं।



25 साल बाद जब कीटनाशकों के दुष्प्रभावों का आकलन लगभग पूरा हुआ तो इससे बचाव की ओर शोध कार्य शुरू हुआ। इसमें वैदिक शास्त्रों में बताए गए पंचगव्य शामिल किया। गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर शामिल रहे। चूहों पर गोमूत्र के असर का प्रयोग किया तो पता चला कि माइक्रोफेज की क्षमता बढ़ी। प्राकृतिक, कोशकीय, द्रवीय सभी मजबूत हुए।
बताया कि गोमूत्र कितना असरकारक है इसका प्रयोग उन्होंने खुद पर भी किया। रोजाना सुबह दस मिलीलीटर गोमूत्र अर्क के सेवन से इम्यूनोग्लोबिन की मात्रा 50 फीसदी, एंटीबॉडी बढ़ाने की क्षमता 58 फीसदी, टी सेल की क्षमता 60 फीसदी, डीटीएच दोगुनी, साइटोकाइन्स की 25 फीसदी तक बढ़ी मिली। इससे इम्युनिटी भी संतुलित होती है। अब तक 26 प्रयोग कर चुके हैं। शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हैं।
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