कौशल प्रशिक्षण योजना से रोजगार देने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं मगर, इन दावों की हकीकत कुछ और है। प्रशिक्षण के नाम पर लखनऊ और बरेली के दो एनजीओ चार हजार बेरोजगारों के भविष्य से खिलवाड़ कर एक करोड़ रुपये हड़प गए। बेरोजगारों को न तो प्रशिक्षण मिला और न ही नौकरी मिल सकी। कार्रवाई के नाम पर दोनों एनजीओ का पेमेंट रोकने की बात कहकर खानापूरी कर दी गई।
नगरीय विकास प्राधिकरण (डूडा) ने वित्तीय वर्ष 2014-15 में कौशल प्रशिक्षण एवं नियोजन के माध्यम से अकुशल शहरी गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए लखनऊ के वीकॉल और बरेली के फ्यूचर सेफ से ट्रेनिंग देकर रोजगार उपलब्ध कराने के लिए 1.15 करोड़ रुपये का अनुबंध किया था। दोनों एनजीओ को डूडा से चयनित चार हजार बेरोजगारों को ब्यूटीशियन, जरी जरदोजी, कंप्यूटर, सिलाई कढ़ाई, प्रयोगशाला सहायक और राजगिरी मिस्त्री ट्रेडों में ट्रेनिंग देकर प्लेसमेंट उपलब्ध कराना था। प्रदाता फर्मों ने चयनित बेरोजगारों को सिर्फ कागजों में प्रशिक्षण देने की खानापूरी कर करीब एक करोड़ का पेमेंट भी करा लिया। विभिन्न ट्रेडों में नाममात्र का प्रशिक्षण पाए बेरोजगार दर-दर भटक रहे हैं। किसी भी बेरोजगार को न तो नौकरी मिल पाई और न ही वह अपना व्यवसाय करने लायक बन पाए। अब कार्रवाई के नाम पर दोनों एनजीओ का बकाया कुछ भुगतान रोकने की बात कहकर मामले को दबाया जा रहा है। कुल मिलाकर पूरे मामले में बजट का बंदरबांट होने के बाद भी बेरोजगारों को सरकार की योजना का कोई फायदा नहीं मिला।
‘चार हजार बेरोजगारों को ट्रेनिंग दी गई लेकिन उनको रोजगार नहीं मिला। एनजीओ का पेमेंट रोककर 34 लाख रुपये शासन को वापस भेजे जा रहे हैं।’ एसी तिवारी, पीओ डूडा