दो साल पहले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नीदरलैंड के दौरे से सड़क के किनारे ‘साइकिल ट्रैक’ बनाने का आइडिया लेकर आए थे। सेहत सुधारने, प्रदूषण कम करने के बहाने सरकार ने अपने चुनाव चिह्न साइकिल के जनता के बीच प्रचार प्रसार करने के मकसद से महानगरों में साइकिल ट्रैक बनाने का फरमान जारी कर दिया। यूपी के बड़े शहरों में ‘साइकिल ट्रैक’ निर्माण पर डेढ़ सौ करोड़ से ज्यादा का बजट खर्च होने के बाद भी इन पर साइकिल नहीं दौड़ पाई। साइकिल ट्रैक पर अवैध कब्जे होने से चौड़ी सड़कें संकरी जरूर गईं जो रोजाना जाम की वजह बन रही हैं।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ, आगरा, बरेली, गाजियाबाद, इटावा समेत अधिकांश शहरों में 28 जगह बनाए गए साइकिल ट्रैकों पर डेढ़ करोड़ से ज्यादा का बजट खर्च हो चुका है लेकिन किसी भी शहर के साइकिल ट्रैक पर साइकिल नहीं चली। लखनऊ में टेंढ़ी पुलिया और कुर्सी रोड पर बनाए गए साइकिल ट्रैक पर दुकानें खुल चुकी हैं। पत्रकारपुरम में 27.50 करोड़ की लागत से बने साइकिल ट्रैक पर चाय के ठेले लगते हैं। लखनऊ में सबसे बड़ा साइकिल ट्रैक लोहिया पथ पर बना है जिसकी लंबाई छह किलोमीटर है। यहां भी अवैध कब्जे हैं। बरेली में शहामतगंज से सेटेलाइट तक बने तीन करोड़ के साइकिल ट्रैक पर मोटर मैकेनिकों ने कब्जा कर लिया है, जहां वह ट्रक, मोटर आदि सामान रखते हैं। बरेली में ही आठ करोड़ से रामपुर-दिल्ली हाइवे पर साइकिल ट्रैक बनाने का प्रस्ताव था जो कि अब तक परवान नहीं चढ़ पाया। ये साइकिल ट्रैक प्राधिकरणों ने बनाए हैं।
सरकार ने आगरा से इटावा तक 165 किलोमीटर लंबा और आठ फुट चौड़ा साइकिल ट्रैक बनाने का प्रस्ताव है जिसे पीडब्ल्यूडी बनाएगा। इस पर आम जनता का आवागमन प्रतिबंधित रहेगा। हालांकि अभी ये साइकिल ट्रैक निर्माण में बहुत ज्यादा प्रगति नहीं हो पाई है। गाजियाबाद में भी पांच किलो से ज्यादा लंबा साइकिल ट्रैक करोड़ों के बजट खर्च के बाद भी बेकार है। किसी भी ट्रैक पर साइकिल नहीं दौड़ रही है। करोड़ों खर्च करने के बाद भी मुख्यमंत्री का नीदरलैंड का आइडिया ब्यूरोक्रेसी ने फ्लाप कर दिया।
‘साइकिल ट्रैक निर्माण में नगर निगम, प्रशासन और पुलिस का सहयोग नहीं मिला। अगर इन विभागों का सहयोग मिलता तो अतिक्रमण हट जाता और साइकिल चलती। उच्च स्तर पर समन्वय के प्रयास होने चाहिए थे।’ अजय सिंह, चीफ इंजीनियर बरेली विकास प्राधिकरण