मंझा गांव में ट्रांसलोकेट किए गए पेड़ - विज्ञप्ति
बरेली। हर साल पुराने पेड़ों को काटकर सजावटी पौधों से उनकी भरपाई के दावे पर विशेषज्ञ प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। यह स्थिति तब है जब जिले में वन क्षेत्र एक फीसदी भी नहीं बचा है, हरित क्षेत्र भी महज 1.09 फीसदी है। विकास के नाम पर चल रही आरी से यह रकबा भी सिमटता जा रहा है। इधर, जहरीली हवा से शहर का दम घुट रहा है। इससे निपटने के लिए जो पौधे रोपे गए, देखरेख के अभाव में वे भी सूख रहे हैं। ट्रांसलोकेट किए गए पेड़ भी निगरानी के अभाव में मुरझा रहे हैं।
पिछले दिनों यूनिसेफ की ऑनलाइन वर्कशॉप में पेड़ों की अंधाधुंध कटान को जलवायु परिवर्तन का अहम कारक माना गया था। मंथन के बाद विशेषज्ञों ने एक पेड़ काटने के बदले दस पेड़ लगाने के नियम का कड़ाई से पालन करने का सुझाव भी दिया था। बरेली कॉलेज के चीफ प्रॉक्टर बॉटनी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक खरे के मुताबिक वृहद पौधरोपण अभियान के जरिए जिले के हरित क्षेत्र को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन निगरानी के अभाव में पौधे पनपने से पहले ही मुरझा जा रहे हैं। ‘हरियाली’ महज आंकड़ों में ही रहती है।
डॉ. खरे के मुताबिक पिछले दिनों पुराने वृक्ष सहेजने के लिए उनको ट्रांसलोकेट किया गया। इनमें 40 फीसदी पौधे सूख गए। वन विभाग का भी मानना है कि ट्रांसलोकेट किए गए 30 फीसदी पौधे किन्हीं वजहों से मुरझा गए।
विभाग छिपा रहे पौधरोपण के आंकड़े
पिछले दिनों पर्यावरण निगरानी समिति की बैठक में जिलाधिकारी ने तीन साल में हुए पौधरोपण की रिपोर्ट तलब की थी, लेकिन विभागों की ओर से अब तक यह उपलब्ध नहीं कराई गई है। वन विभाग समेत तीन अन्य विभागों ने ही रिपोर्ट दी है।
1.80 लाख में से 50 लाख पौधे सूखे
वन विभाग के मुताबिक पौधरोपण के बाद 10-30 फीसदी पौधे सूख जाते हैं। पांच साल में रोपे गए 1.80 करोड़ में से 18 लाख पौधों के सूखने की आशंका वन विभाग ने जताई है। वहीं, विशेषज्ञों के मुताबिक करीब 50 लाख से ज्यादा पौधों ने दम तोड़ा है। शासन की ओर से पिछले वर्षों में हुई गणना में 70 फीसदी पौधे जीवित मिले थे।