तो फिर सारे प्राइमरी स्कूल ऐसे क्यों नहीं हो सकते
- फोटो : Then why can not all the primary schools be such
सरकारी प्राथमिक विद्यालय को लेकर लोगाें के मन में बन चुकी आम धारणा को भरतौल और डोहरा के मॉडल स्कूल से तोड़ने की कोशिश की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं यहां के शिक्षक। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलाें का दर्जा प्राप्त इन स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती भी सीधे इलाहाबाद से हुई है। भरतौल में तो काफी हद तक बदलाव दिखने भी लगा है। यहां बच्चों के लिए सिर्फ खाकी ड्रेस ही नहीं है बल्कि उनके लिए टाई, बेल्ट और जूते मौजों की व्यवस्था की गई है ताकि बच्चे खुद को कान्वेंट स्कूल के बच्चों जैसा ही समझें। हीन भावना कम हो। सुबह की प्रार्थना से लेकर दोपहर में छुट्टी होने तक यहां का रूटीन तय है। इसलिए इन स्कूलों में एडमिशन के लिए लोग सिफारिश भी लगवा रहे हैं।
भरतौर प्राइमरी स्कूल में कक्षा एक से पांच तक 179 छात्र पढ़ते हैं। इस साल यहां 36 एडमिशन हो चुके हैं और करीब 12 एडमिशन पेंडिंग में हैं। एक तरफ जहां प्राइमरी स्कूलों के शिक्षक अभियान चलाकर बच्चों की संख्या बढ़ाते हैं वहीं यहां के अभिभावक खुद अपने बच्चों को ला रहे हैं। स्कूल में वार्षिक फंड 5 हजार रुपए ही मिलता है। इससे कुछ होता नहीं इसलिए शिक्षक भी कंट्रीब्यूट करते हैं। शिक्षक आनंद कहते हैं कि एडमिशन लेने वाले बच्चाें को बता दिया जाता है कि यहां पंखा व बिजली नहीं है फिर भी एडमिशन के लिए लोग आते हैं।
कांवेंट से कम नहीं
स्कूल का अपना फेसबुक पेज है जिसे यहां की इंचार्ज शिवानी जौहरी व शिक्षक शैलजा त्रिपाठी व आनंद जायसवाल संभालते हैं। वार्षिकोत्सव भी बकायदा फुल ड्रेस के साथ होता है। बच्चों की किताबों पर आपको कवर चढ़ा हुआ मिलेगा जो अमूमन प्राथमिक विद्यालयों में कोई ध्यान नहीं देता। कमरों में चटाई और कालीन डाली गई है। बच्चे सुबह आते ही एसेंबली के लिए जुटते हैं इसके बाद अपने जूतों को कायदे से रखते हैं। बच्चों ने खुद से कमरों को सजाया है।
- डोहरा में बाल संसद से बच्चों को बना रहे हैं आत्मनिर्भर
डोहरा प्राइमरी स्कूल में 162 बच्चे पढ़ते हैं। इंचार्ज तरनजीत कौर बताती हैं कि एडमिशन न करने की शिकायत बीएसए के पास पहुंच चुकी है। आरोप लगा था कि मैं पैसे लेकर एडमिशन करती हूं, लेकिन यह झूठ साबित हुआ। तरनजीत के साथ रमोना मेसी, मीनू और अंशिका यहां बच्चाें को पढ़ाती हैं। तरनजीत का कहना है कि उनका मॉडल स्कूल बेशक भरतौल की तरह नहीं हैं, क्योंकि वे लोग खुद का वेतन इसमें खर्च नहीं करती हैं। कोशिश रहती है कि बच्चे हमारे भी किसी से कम न हों। हालांकि स्कूल में कार्टून पेंटिंग और चारदीवारी पर थोड़ा पैसा जरूर खर्च किया गया है। इस स्कूल में बाल संसद शनिवार को होती है जिसमें बच्चे अपनी समस्याएं बताते हैं फिर चाहे व स्कूल की हो या फिर घर, मोहल्ले की। मॉनीटर मिड डे मील में बच्चाें को सफ ाई से खाना खिलाने पर नजर रखते हैं।