बरेली। धर्म और जाति की दीवारें आज भी समाज में कमजोर होती नहीं दिख रही हैं, लेकिन इसी समाज के तमाम लोग ऐसे हैं जिन्होंने समाज की बंदिशों को तोड़कर प्रेम विवाह किया और साल दर उनके प्यार की उम्र लंबी होती गई। वैलेंटाइन्स वीक शुरू होते हुए ऐसे सफल प्रेमी परिवारों का जिक्र न हो, जैसे प्रेम का शब्द अधूरा लगता है। कुछ दुख, त्याग, समर्पण और ढेर सारा संघर्ष ही उन परिवारों की नींव रही है। ऐसे सफल लोगों से मिलिए और अपने अंदर प्रेम की ऊर्जा भरिए...
उनके लिए खुद को फना कर दिया हमने : होडेल शर्मा
बरेली। ‘वादा-ए-वफा करो तो फिर खुद को फना करो, वरना खुदा के लिए किसी की जिंदगी ना तबाह करो।’ ये शायरी इंटर कॉलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल होडेल प्रसाद शर्मा की है, जो प्यार में जाति धर्म के बंधन को तोड़कर लिखी गई प्रेम कहानी को 34 साल बाद भी जीवंत बनाए हुए है। अलग-अलग संप्रदाय से होने के बाद भी वह अपनी धर्मपत्नी नुजहत आरा के साथ जीवन के सातवें दशक में भी सफल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं।
शहर में रह रहे होडेल जनपद एटा के मारहरा कस्बे के मूल निवासी हैं। वह ब्राह्मण परिवार से और बदायूं की नजहत आरा प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार से थीं। नुजहत के पिता मोहम्मद मुख्तार खलील अलीगढ़ जीआईसी में प्रिंसिपल हुआ करते थे। होडेल प्रसाद शर्मा बताते हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से 1976 में बीएड करने के बाद वह ब्राह्मण पालीवाल इंटर कालेज में शिक्षक नियुक्त हुए थे, तब नुजहत अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से बीए कर रही थीं। होडेल को उर्दू भी खूब आती थी, यह बात नुजहत को भा गई। नुजहत के पिता से हिम्मत जुटाकर कहा। थोड़ी बहुत ना नुकुर के बाद उनके परिवार वाले भी सहमत हो गए। 1982 में अलीगढ़ कोर्ट में दोनों ने शादी की। 34 साल के सफल वैवाहिक जीवन में दोनों के बिनी और जिमी दो बेटे हैं। अब होडेल प्रसाद शर्मा रिटायर हो चुके हैं जबकि नुजहत आरा जीबी पंत इंटर कालेज बहेड़ी में प्रिंसिपल हैं। होडेल प्रसाद शर्मा बताते हैं कि वह और उनकी पत्नीसभी धर्मों का सम्मान करते हैं। हम दोनों के बीच धर्म की परंपराएं कभी आड़े नहीं आईं। घर में होली, दिवाली, ईद, बकरीद, रक्षाबंधन समेत सभी त्योहार मनाए जाते हैं।
ऐसे संघर्ष में कष्ट नहीं, ऊर्जा मिलती : प्रो. रीना - शौकत अली
बरेली। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पूर्व डीन प्रो. शौकत और प्रो. रीना जायसवाल इस समाज के लिए मिसाल हैं, जो जाति और धर्म के नाम पर झगड़ते हैं। प्रो. रीना जायसवाल 1983 में बीएचयू से एलएलबी कर रही थीं। प्रो. शौकत अली उनके शिक्षक थे। उन्होंने एलएलबी में प्रो. शौकत अली की क्लास पढ़ी। उनके पढ़ाने का अंदाज़-ए-बयां और ज़हनियत दिल को छू गया। प्रो. शौकत अली का ज्ञान उन्हें आज भी प्रभावित करता है। उनसे पढ़ते हुए उन्होंने काफी कुछ सीखा। धीरे-धीरे वह उनके लिए फ्रेंड, फिलॉसफर, गाइड सबकुछ बन गए। बीएचयू में 1987 में प्रो. रीना लॉ की पहली जेआरएफ हुई। इसके बाद ही दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद प्रो. शौकत अली रुहेलखंड विश्वविद्यालय आ गए और यहां पर लॉ विभाग की स्थापना की। 1989 में प्रो. रीना जायसवाल की भी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में नियुक्ति हो गई। प्रो. रीना ने बताया, लीक से हटकर जीवन में कुछ भी हो तो संघर्ष तो करना ही पड़ता है, लेकिन ऐसे संघर्ष में कष्ट नहीं, बल्कि और ऊर्जा मिलती है। प्रो. शौकत अली के साथ जीवन तय करने के लिए मुझे समाज से काफी लड़ना पड़ा। परिवार से तो ज्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन समाज में सहना पड़ा। आज तो ऐसा लगता है कि जैसे सब जीत लिया। हम लोगों के लिए हमारे छात्र ही हमारे बच्चे हैं, बाकी साथ जी रहे हैं और गर्व महसूस कर रहे हैं।
अंतर-जातीय विवाह पर परिवार रूठा है : डॉ. रमेश-नमिता
बरेली। बरेली कॉलेज के पोस्ट डॉक्टोरल फेलो डॉ. रमेश त्रिपाठी और डायट की प्रवक्ता डॉ. नमिता 2005 में कॉलेज में ही एक-दूसरे के मित्र बने। उसी साल डॉ. रमेश को एमए राजनीति शास्त्र में और डॉ. नमिता को एमएससी जुलॉजी का गोल्ड मेडल मिला। उसी समय पर दोनों ने तय किया कि शादी करेंगे, लेकिन शादी के फैसले को समाज के सामने अमलीजामा पहनाने में पांच साल लग गए। इस बीच डॉ. नमिता ने तो अपने परिवार को राजी कर लिया, लेकिन डॉ. रमेश का परिवार अब तक उनके सुख-दुख में शामिल नहीं हुआ है। अपने बेटे की शादी में भी वह आशीर्वाद देने भी नहीं आए। अंतर-जातीय विवाह की वजह से उनका परिवार रूठा हुआ है। डॉ. रमेश और डॉ. नमिता के परिवार में अब एक सदस्य के रूप में साढ़े तीन साल की नयनिका भी शामिल हैं। राजेंद्र नगर में तीनों खुशी से साथ रहते हैं। अब डॉ. नमिता को इंतजार है तो सिर्फ अपनी ससुराल का, पता नहीं कब जाए लें तो जिंदगी मुकम्मल हो जाएगी।