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सादगी से गुजर गई रौनक वाली रात

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एक मस्जिद के बाहर शबे बरात पर दुआ करते बच्चे। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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घरों पर नियाज नजर कर इबादत में गुजारी रात, मरहूमीन के लिए की मगफिरत की दुआएं
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कब्रिस्तानों पर न रोशनी कर पाए न चिरागां, घरों पर की मोमबत्तियों से रोशनी, सड़कें रहीं सूनी

बरेली। शायद यह पहला मौका होगा जब सबसे ज्यादा रौनक वाली रात सादगी से गुजर गई। लॉक डाउन के चलते शब-ए-बरात घरों में ही इबादत की। कब्रिस्तान में चिरागां नहीं कर पाए। ऐसे तमाम लोग मायूस भी रहे, जिनके परिवार में इसी साल या आस पास के दिनों में किसी किसी का इंतकाल हुआ और वह पहली शब-ए-बारात पर अपने मरहूमीन की कब्रों पर नहीं जा सके।
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कोरोना वायरस के चलते लॉक हाउन का पालन करते हुए मुस्लिम इस बार शब-ए-बारात पर घरों से नहीं निकले। न ही कब्रिस्तान जा कर अपने बुजुर्गों की कब्रों पर फातेहा पढ़ सके न ही चिरागां किया। हां इतना जरूर देखने आया कि कब्रिस्तान के आस पास रहने वाले लोग, जिनके मरहूमीन सामने के कब्रिस्तानों में दफ्न हैं.. उन्होंने अपने घरों की छत या बालकनी से खड़े हो कर फातेहा पढ़ी। यह मंजर सिटी के एक मीनार कब्रिस्तान, सिटी कब्रिस्तान, हुसैन बाग, सिटी लाइन पार, कांकर टोला में देखने को मिला। इसके अलावा कुछ लोग दिन में कब्रिस्तान में काम करने वाले लोगों फूल मोमबत्तियां और अगरबत्तियां जलाने के लिए देकर चले गए। अधिकतर लोगों ने घरों में नियाज नजर जरूर की, रात भर घरों पर इबादत की और मरहूमीन की मगफिरत के लिए दुआएं मांगी। घरों पर रोशनी की गई गई। कहीं मोमबत्तियां तो कहीं चिराग रोशन किए गए। इसके बाद घर घर लोग इबादतों में मशगूल हो गए। रात भर घरों से कुरान की तिलावत गूंजती रही। जहां हर शब-ए-बारात को शहर की सड़कों पर पूरी रात रौनक होती थी। तमाम लोग एक इधर से उधर बाइकों से आते जाते दिखाई देते थे, वह सड़के सुनसान पड़ी रहीं।
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