इंटरनेट पर चैटिंग, फ्रेंडशिप और फिर चीटिंग। जब ऑनलाइन दोस्ती की बात आती है तो अक्सर अखबार और टीवी पर देखी ऐसी घटनाएं ही उदाहरण बनकर जेहन में आ जाती हैं पर, ऑनलाइन संवाद के बारे में युवाओं की राय अलग है। इन घटनाओं को वह इस माध्यम का सिर्फ एक पहलू भर मानते हैं। ‘टेक्स्ट फ्रेंडशिप’ के दायरे में युवाओं ने सिर्फ दोस्तों को नहीं रखा है, बल्कि स्मार्टफोन यूजर रिश्तेदारों से भी उनका नया रिश्ता बना है। यह है शब्दों के संवाद का रिश्ता। टेक्स्ट मैसेज के रिश्तों पर प्रभाव को टटोलती खबर।
एमएससी की छात्रा ज्योति कहती हैं कि मैसेज में इमोजी के विकल्प होने से अपने फीलिंग्स बताना आसान हो जाता है। हालांकि वह मानती हैं कि टेक्स्ट मैसेजिंग में मिस कम्युनिकेशन की संभावना ज्यादा रहती हैं। इसलिए यहां ऐसे लोग लंबे समय तक बिना विवाद के बात कर पाते हैं जो एक-दूसरे को समझते हैं। सॉफ्टवेयर इंजीनियर अभिषेक का कहना है कि वह अपने कई रिश्तेदारों से टेक्स्ट के जरिए ही बात करते हैं और फोन पर बात करने से ज्यादा वह टेक्स्ट में ही संवाद करने में सहज महसूस करते हैं। जब ऑनलाइन फ्रेंडशिप की बात आती है तो सवाल रिश्ते के टिकाऊ होने का भी उठता है। आकांक्षा कहती हैं कि ज्यादातर लोग ऑनलाइन दोस्ती टाइम पास के लिए करते हैं, इंटरनेट पर अपनी जानकारियां छुपाकर या अज्ञात बनकर चैटिंग करने का मौका देने वाली कई वेबसाइट मौजूद हैं, पर जो लोग गंभीरता से रिश्ते निभाते हैं वे रिश्ते चाहे इंटरनेट से ही क्यों न जुड़े हो, पक्के होते हैं। मनोवैज्ञानिक सुविधा शर्मा कहती हैं कि इंटरनेट पर चाहे कोई अंजान से बात करता हो या कोई जान पहचान के व्यक्ति से, वहां जुड़ाव भावनात्मक रूप से नहीं होता। शब्दों के माध्यम से संवाद की दोस्ती या टेक्स्ट फ्रेंडशिप पहले के दौर में होने वाली पेन फ्रेंडशिप के जैसी ही है। पर तुरंत जवाब का इंतजार, मैसेज पढ़ने के बाद भी रिस्पांस न मिलने पर होने वाली रिश्ते को लेकर असुरक्षा और चिड़चिड़ाहट खतरनाक है। हालांकि यह माध्यम रिश्तों में एक नई समझ पैदा करने का जरिया तो बन ही रहा है।