बरेली। आगरा की ब्लैकलिस्ट फर्म को करोड़ों का ठेका दिए जाने के मामले में नगर निगम की जांच टीम अन्य तकनीकी विभागों से नियमों की जानकारी ले रही है। इसमें कोई फर्म ब्लैकलिस्ट कैसे होती है और उसे इससे बाहर कैसे लाया जा सकता है? आदि सवाल पूछे जा रहे हैं। चर्चा है कि अगर सही जांच रिपोर्ट सामने आई तो कई अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है।
आगरा की परमार कंस्ट्रक्शन फर्म को 5.28 करोड़ का टेंडर देने के मामले में उप नगर आयुक्त पूजा त्रिपाठी, मुख्य अभियंता मनीष अवस्थी और लेखाधिकारी अनुराग सिंह की समिति जांच में जुटी है। अपर नगर आयुक्त और ठेकेदारों का तर्क है कि ब्लैकलिस्ट फर्म दो साल बाद स्वत: उस सूची से बाहर आ जाती है, जबकि अभियंता का कहना है कि ब्लैकलिस्ट हो चुकी फर्म को पैनल में शामिल करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
जांच समिति में शामिल लेखाधिकारी छुट्टी चले गए हैं। वह सोमवार को लौटेंगे। इस वजह से जांच रुक गई है। यह हाल तब है, जबकि नगर आयुक्त ने इस मामले की जांच के लिए पांच दिन का समय दिया था। इसके तहत शुक्रवार को टीम इसकी जांच रिपोर्ट नगर आयुक्त को सौंपती। वहीं, सीनियर अफसर की जांच जूनियर अफसर से कराने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। चर्चा है कि जूनियर को जांच सौंपकर अपर नगर आयुक्त के बचने का रास्ता साफ किया जा रहा है। संवाद
ये है मामला
आगरा की परमार कंस्ट्रक्शन फर्म ने अक्टूबर 2020 में स्मार्ट सिटी कंपनी में टेंडर डाला था। इसमें आगरा विकास प्राधिकरण के अनुभव प्रमाण पत्र लगाए गए थे। इसके बाद तत्कालीन नगर आयुक्त अभिषेक आनंद ने फर्म को ब्लैकलिस्ट कर दिया था। इसके बाद इसी फर्म को वर्ष 2023 में 5.28 करोड़ का ठेका दे दिया गया।
वर्जन
जांच में जिसकी भी लापरवाही सामने आएगी, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। जांच समिति को जल्द रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। - संजीव कुमार मौर्य, नगर आयुक्त