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दिल व दिमाग दुरुस्त रखने का महीना है फागुन

Mon, 21 Mar 2016 07:23 PM IST
बृजेश दुबे, अमर उजाला बरेली।
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dgd - फोटो : getty images
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भारतीय धार्मिक परंपराओं में होली की शुरुआत महामारी को रोकने के लिए की गई थी। केवल होली ही नहीं, सर्दी जाने और कड़ी गर्मी आने के बीच के समय में पैदा होने वाले संक्रामक रोगों और अवसाद आदि को दूर करने के लिए पूरे फाल्गुन माह में रोग निवारक उत्सवों की परंपरा थी। माघ शुक्ल पंचमी यानी बसंत पंचमी से शुरू यह उत्सव फागुन माह में अपने चरम पर होते थे और लोगों को दिल, दिमाग और शरीर की बीमारियों से दूर रखते थे। इन उत्सवों में सफाई, सजावट और मन को प्रसन्न रखने वाले कार्यक्रम मुख्य रूप से होते थे। 
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भारतीय मौसम चक्र के अनुसार माघ शुक्ल पक्ष से चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक मौसम में उतार-चढ़ाव होते हैं। इससे श्लेष्मा (म्यूकस) बढ़ता है, जिससे पेट संबंधी रोग बढ़ते हैं। मच्छर और मक्खियों की तादाद बढ़ने से फ्लू संबंधी रोग बढ़ते हैं। इसी दौरान पतझड़ के कारण वातावरण में भारीपन होने से लोगों में अवसाद बढ़ता है। इनसे बचने के लिए उत्सवों की परंपरा शुरू की गई थी, जिसमें होली प्रमुख थी। इस दिन सभी प्रकार का कूड़ा करकट इकट्ठा कर औषधि युक्त लकड़ी के साथ जलाया जाता था, ताकि जीवाणु और विषाणु मर जाए। लिंग पुराण से लेकर विभिन्न सूत्रों में होली और फाल्गुन माह में विभिन्न उत्सवों की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इन उत्सवों से चेचक, छोटी माता, हैजा, सूखा रोग, मलेरिया और फ्लू आदि रोगों को रोका जाता था।

-----ये हैं प्रमुख फाल्गुनी उत्सव

मदन महोत्सव/शारदा महोत्सव (वसंत पंचमी)
माघ शुक्ल पंचमी से गुनगुनी धूप का आना माना जाता है। प्रकृति नया चोला ओढ़ती है और ठंड के कारण हुए मानसिक अवसाद से मुक्ति के लिए वसंत पंचमी से होली तक का मदनोत्सव शुरू होता था। इसे द्वापर युग में मनाया जाता था। एंटीबायटिक के रूप में हल्दी का टीका और लेपन की परंपरा थी।
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महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी) 
शिव विवाह की धार्मिक मान्यता के साथ यह उत्सव फागुनी उल्लास का मध्यमास माना जाता है। शिव बारात से अबीर गुलाल को मलकर प्रेम प्रदर्शन शुरू होता था। साथ ही ठंडे पदार्थों का खानपान भी इस दिन से शुरू होता था।

राका होलाका 
सतयुग में द्युंद्या नामक महामारी फैलने पर श्री राम के पूर्वज राजा रघु ने राज्य में कई स्थानों पर शमी की लकड़ी गाड़ कर उसके चारों तरफ कूड़ा-करकट इकट्ठा कर उसे औषधि युक्त लकड़ी से जलवाया और अगले दिन उसकी राख से प्रजा खेलने के लिए कहा। इससे महामारी दूर हो गई। होलिका नामक अग्नि प्रज्ज्वलित होने और राका को देवता माने जाने के कारण इसे राका होलाका कहा गया। इसका उल्लेख जैमिनी, काठकगुह्य, शबर के सूत्र और वात्स्यायन के कामसूत्र में मिलता है।

धुलेंदी/होली
अपने पुत्र प्रह्लाद को जलाने के लिए उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर लकड़ी के ढेर में राक्षसों के राजा हिरण्यकश्यप ने आग लगाई थी लेकिन प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई। खुशी में विष्णु भक्तों ने अगले दिन होली खेली। दूसरी मान्यता के अनुसार शिव की तपस्या भंग करने के लिए जब देवताओं ने कामदेव को भेजा। तपस्या भंग होने पर शिव ने तीसरे नेत्र ने कामदेव को भस्म कर दिया। परंतु सृष्टि को बचाने के लिए देवताओं की विनती पर शिव ने कामदेव को अनंग होने, उनकी भस्म को सभी पर रगड़ने और उल्लसित होने का वरदान दिया। 

शीतला अष्टमी
मदनोत्सव का अंत चैत्र कृष्णपक्ष की अष्टमी को माना जाता है। इस दिन से गर्मी के बढ़ने की मान्यता है। ऐसे में घर की सफाई कर पूरे घर को पानी से धोकर शीतला देवी की पूजा की जाती है। ब्रज में इस दिन बासी खाना खाते हैं। मान्यता है कि इसके बाद शरद पूर्णिमा तक बासी खाना नहीं खाया जाएगा।
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