बरेली। दुश्मन देशों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए शहर में स्थित त्रिशूल एअरबेस हमेशा चौकन्ना रहता है। इस एअरबेस का कंट्रोल कभी आराम नहीं करता। देश की सीमा पर हल्की सी हरकत पर भी एअरबेस की नजर रहती है। साथ ही, शहर के विकास में भी एअरबेस सहयोग कर रहा है।
एक्स सर्विसमैन वेलफेयर कोआर्डिनेशन कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष जेएस भाकुनी के मुताबिक त्रिशूल एअरबेस भारतीय वायुसेना का अहम हिस्सा है। उत्तराखंड में केदारनाथ त्रासदी समेत कई अन्य रेस्क्यू ऑपरेशन इस एअरबेस ने चलाए हैं। त्रिशूल के एएलएच
हेलीकॉप्टर ने केदारनाथ आपदा में फंसे लोगों को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई थी। चर्चा है कि जम्मू कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान फाइटर प्लेन मिराज त्रिशूल एयरबेस से ही होकर गए थे। चीन बॉर्डर की निगरानी के साथ ही हर स्थिति से निपटने के लिए त्रिशूल एयरबेस सबसे सजग रहता है।
एलएसी से होती है दुश्मन देश की निगरानी
त्रिशूल एयरबेस से लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की निगरानी की जाती है। ताकि दुश्मन देशों की आसमान के रास्ते होने वाली किसी भी गतिविधि का पता चल सके। कंट्रोल रूम हर पल सजग रहता है, क्योंकि एक झपकी देश के लिए मुसीबत बन सकती है। हल्की सी हलचल हो या कोई हेलीकॉप्टर भारत की सीमा के आसपास मंडराता है तो एअरबेस के फाइटर प्लेन चंद मिनट में सटीक निशाना लगाकर उसे नेस्तनाबूद करने में सक्षम हैं।
राहत, बचाव कार्य के लिए एएलएच यूनिट
त्रिशूल एअरबेस पर ही एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (एएलएच) यूनिट है, जिसे रेस्क्यू ऑपरेशन और रसद आदि पहुंचाने में प्रयोग करते हैं। यहां सिग्नल यूनिट भी है, ताकि लड़ाकू विमानों को जरूरी सिग्नल और संदेश भेजे जा सकें। एअरबेस का मुख्य लक्ष्य सर्विलांस, दुर्घटना के दौरान राहत और बचाव कार्य की जिम्मेदारी निभाना है। इसके अलावा सैन्य यूनिटों को लॉजिस्टिक सपोर्ट भी देने में एयरबेस की अहम भूमिका होती है।
पर्यटन, उद्योग विकास में भी अहम योगदान
बरेली एयरपोर्ट से उड़ान के लिए एयरफोर्स का रनवे इस्तेमाल होता है। इससे बरेली और आसपास के अन्य शहरों में पर्यटन और औद्योगिक विकास को गति मिल रही है। अब यहां से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू व जयपुर के लिए हवाई सेवा शुरू हो चुकी है। बता दें कि एअरबेस की स्थापना वर्ष 1962 में चीन से युद्ध के बाद 14 अगस्त 1963 को हुई थी। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में थल सेना यूनिटों को वायु सहायता मिलती।