बरेली। स्मार्ट सिटी के जिस प्रोजेक्ट के दम पर पहले 20 शहरों में आने के जोर शोर से दावे किए जा रहे थे, हकीकत में इसे बनाने में घोर लापरवाही बरती गई। नगर निगम और कंसल्टेंट एजेंसी ने सिर्फ तीन वर्कशाप की खानापूरी कर आनन-फानन में स्मार्ट सिटी का कमजोर प्रोजेक्ट बनाया। प्रोजेक्ट के फाइनेंशियल प्लान में रामगंगा नगर में ग्रीन फील्ड विकल्प के तहत 4158 करोड़ से नया स्मार्ट सिटी बसाने की बात तो कही गई लेकिन इतना बड़े बजट में निवेशक कौन-कौन होंगे और ये बजट आगामी दो या तीन साल में रिकवर कैसे होगा, यह नहीं बताया गया। फंडिंग के लिए केंद्र सरकार पर हद से ज्यादा निर्भरता बरेली के प्रोजेक्ट को 88 वें नंबर पर ले गई। नगर निगमों की कमजोर माली हालत ने बरेली समेत यूपी सरकार के चयनित 12 शहरों को स्मार्ट सिटी बनने की दौड़ में काफी पीछे ढकेल दिया।
सरकार ने अमेरिका की कंसल्टेंट एजेंसी इंटरनेशनल सिटी से स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट बनाने के लिए दो करोड़ में अनुबंध किया था। इसके लिए एजेंसी को 39 लाख से ज्यादा की रकम एडवांस भुगतान कर दी गई। बाकी पेमेंट की स्थिति का नगर निगम समेत किसी भी सक्षम अधिकारी को पता नहीं है। कंसल्टेंट एजेंसी के छह प्रतिनिधियों ने दो माह से ज्यादा समय तक चले स्मार्ट सिटी के सर्वे में केवल आंकड़े एकत्र किए। एजेंसी ने स्थानीय स्तर पर न तो अपना दफ्तर बनाया और न ही सरकारी दफ्तरों में अपने प्रतिनिधियों के आवागमन के लिए वाहन की व्यवस्था की। प्रोजेक्ट में शहरवासियों की भागेदारी भी बहुत संतोषजनक नहीं रही। पहली वर्कशाप में 90 फीसदी पार्षद नदारद थे। उद्यमी, चिकित्सक, स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़े लोग, व्यवसायी, महिलाएं, नौकरीपेशा, सिविल सोसायटी की हिस्सेदारी भी न के बराबर थी। ऑनलाइन पोल और वर्कशाप के निष्कर्ष के आधार पर रामगंगा नगर में बीडीए की 670 एकड़ जमीन पर 4158 करोड़ की लागत से नया स्मार्ट सिटी बसाने का फाइनेंशियल प्लान बना लिया गया। अब नगर निगम समेत कंसल्टेंट एजेंसी भी अपना फाइनेंशियल प्लान कमजोर मान रही है।
ऐसे कमजोर था फाइनेंशियल प्लान
रामगंगा नगर में नया स्मार्ट सिटी बसाने पर 4158 करोड़ रुपये खर्च होंगे। केंद्र सरकार से पांच सौ करोड़ मिलेंगे। इसमें राज्य सरकार की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत होगी। नगर निगम की 25 फीसदी हिस्सेदारी को बजट कहां से आएगा, यह नहीं बताया गया। नगर निगम ने अपने हिस्से की रकम भी राज्य सरकार के खाते में डाल दी। राज्य सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह स्मार्ट सिटी की 50 फीसदी रकम कहां से लाएगी। 36 सौ करोड़ से ज्यादा बजट निवेश और जमीन की बिक्री से आने का जिक्र फाइनेंशियल प्लान में किया गया। मगर यह नहीं बताया गया कि शहर से बाहर इतनी रकम कौन निवेश करेगा और रकम कैसे रिकवर होगी।
अब केंद्र की गाइड लाइन का इंतजार
स्मार्ट सिटी की दौड़ से बाहर होने के बाद केंद्रीय कैबिनेट सचिव की वीडियो कांफ्रेंस में बाकी शहरों को निराश न होने सलाह दी गई। हालांकि वीडियो कांफ्रेंस में बातचीत करने का मौका केवल लखनऊ को मिला। बरेली का नंबर यहां भी नहीं आ पाया। अपर नगर आयुक्त ईश शक्ति कुमार सिंह का कहना है कि स्मार्ट सिटी पर नगर निगम को सरकार की अगली गाइड लाइन का इंतजार है।
हमें लगता है कि हम बरेली के स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट में फाइनेंशियल इनपुट ठीक से नहीं दे पाए। नगर निगम ने फाइनेंशियल प्लान के बंटवारे का बेहतर प्रस्तुतीकरण नहीं किया। प्लान इतना खराब नहीं था लेकिन यूपी के नगर निगम की खस्ता माली हालत ने फंडिंग के लिए सरकार पर निर्भर रहना दर्शाया और प्रथम 20 की सूची से बाहर कर दिया। अब हमारा अनुबंध खत्म हो चुका है। नया प्रोजेक्ट बनेगा। इसमें हमें दोबारा अनुबंध मिलता है तो हम पुरानी खामियों को दूर करेंगे।
- अनुराग एंथनी, हेड कंसल्टेंट एजेंसी