बरेली के विंडरमेयर थिएटर में किताब महोत्सव के अंतिम दिन रविवार को पुस्तक प्रेमियों की भीड़ उमड़ी। लेखकों और कलाकारों की सहभागिता ने इस उत्सव को यादगार बना दिया। समापन दिवस पर कविता, कहानी, शायरी और संवाद से भरे सत्रों ने बरेली की सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध किया।
कार्यक्रम की शुरुआत ‘किताबें हमें बनाती हैं’ विषय पर वार्ता से हुई। इस सत्र में वरिष्ठ लेखक मृदुला गर्ग, लेखक व चिंतक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी और स्पीकिंग टाइगर प्रकाशन के संपादक रवि सिंह ने संवाद किया। अशोक माहेश्वरी ने कहा कि हमारे व्यक्तित्व को गढ़ने और ज़िंदगी को बनाने में किताबों का योगदान महत्वपूर्ण होता है।
प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि यह जरूरी नहीं कि सब किताबें हमें अच्छा ही बनाएं। हम जिस तरह की किताबें चुनते हैं, वैसी ही सीख मिलती है। ‘ऐलिस इन वंडरलैंड’ और ‘गोरा’ जैसी किताबों का ज़िक्र करते हुए कहा कि पढ़ना एक ऐसा अभ्यास है जो हमें अपने समाज और समय को नए ढंग से देखने की दृष्टि देता है। मृदुला गर्ग ने कहा कि साइलेंट स्प्रिंग (1962) किताब ने उन्हें सर्वाधिक प्रभावित किया। रेचल कार्सन की इस किताब से मुझे पहली बार यह एहसास हुआ कि पर्यावरण, जीवन और मृत्यु एक-दूसरे से जुड़े हैं।
सोशल मीडिया पर साहित्य की भूमिका व रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा पर पर चर्चा
दूसरे सत्र ‘बात किताब’ में सोशल मीडिया पर साहित्य की उपस्थिति और बदलती भाषा पर चर्चा हुई। इस सत्र में बुक-ब्लॉगर सफीना और विनय मिश्र शामिल हुए। तीसरे सत्र में प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा ‘अपनी धुन में’ पर बात हुई। किताब के हिंदी अनुवादक व वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह और संपादक रवि सिंह ने किताब के अनुवाद की प्रक्रिया, बॉन्ड की लेखन शैली और उनके जीवन के प्रेरक प्रसंगों पर बात की। रवि सिंह ने प्रभात सिंह से अनुवाद के दौरान चुनौतियों के बारे में पूछा। इस पर प्रभात सिंह ने कहा, पढ़ते हुए ऐसा लगता था कि मैं इन जगहों और किरदारों को पहले से जानता हूं।
किताब उत्सव में चर्चा करते रवि सिंह और वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह। संवाद
शहर के सांस्कृतिक सरोकारों पर हुआ संवाद
पांचवें सत्र ‘जिनसे शहर बरेली’ में उन शख़्सियतों को याद किया गया, जिन्होंने बरेली की साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान गढ़ी। सत्र में डॉ. अवनीश यादव, शावेज हाशमी, रवि अग्रवाल, शगुफ्ता गजल, रुपाली दामजी, डॉ. सुदीप सरन, श्रवण कुमार और सुनील मानव ने विचार रखे। सत्र का संचालन आशु मिश्रा ने किया।
इस दौरान प्रसिद्ध बाल साहित्यकार निरंकार देवसेवक पर बात करते हुए डॉ. अवनीश यादव ने कहा, वे उन गिने-चुने लेखकों में हैं, जिन्होंने बालमन के सबसे करीब जाकर लिखा। बचपन में जो कविताएं हमें याद थीं, उनमें से ज्यादातर उनकी ही थीं। आज देश का शायद ही कोई राज्य हो, जिसकी पाठ्यपुस्तकों में उनकी कविताएं न हों। शहर का आधुनिक थिएटर से परिचय कराने वाले जेसी पालीवाल को याद किया गया। अध्यापक सुनील मानव ने कहा कि राधेश्याम कथावाचक ने लोक से जुड़ाव पर लिखा है। हम राम कथा पर बात करते हैं तो पहली बार हमारे दिमाग में रामचरित मानस आता है।