मीरगंज। रक्षाबंधन... आत्मीयता का वह अटूट सूत्र है जो समय और दूरी के पर्दे को भेद देता है। मीरगंज के कुतुबपुर गांव में इसका उदाहरण सामने आया। चार बहनों के प्रति स्नेह का बंधन में भाई रूपराम (60) को 35 साल से बाद खींच लाया।
रूपराम ने बताया कि पहली पत्नी के निधन के बाद आनंदपुर निवासी सरला से शादी की। मुंबई जाने पर चिट्ठियां भेजीं लेकिन पत्नी का जवाब नहीं मिला तो संबंध आगे नहीं बढ़ सका। चिट्ठियां भेजनी बंद कर दीं। बताया कि वह 25 साल की उम्र में वह गांव छोड़कर मुंबई गए। वहां तीन दशकों से अधिक समय तक प्लंबिंग का कार्य कर एकाकी जीवन बिताते रहे। संपर्क न होने के कारण परिजन और ग्रामीणों ने उनको मृत मान लिया।
रक्षाबंधन नजदीक आने पर उन्हें चारों बहनों की याद सताने लगी। बहनों से स्नेह और उनसे मिलने की इच्छा उन्हें 35 साल बाद गांव वापस ले आई। शुक्रवार को जब रूपराम गांव पहुंचे, तो ग्रामीण पहचान नहीं सके। सवाल-जवाब से पहचान उजागर होते ही बड़े भाई चुन्नीलाल उनसे लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े। बहनों को भी सूचना दे दी गई है। वे भी भाई के लौटने की खुशी से सराबोर हैं।
भाइयों की दी संपत्ति :
भाइयों ने बताया कि रूपराम की कोई जानकारी न मिलने पर उन्हें मृत मान लिया था। इसी आधार पर उनकी संपत्ति भी दोनों भाइयों चुन्नीलाल और पूरनलाल ने अपने नाम करा ली थी। रूपराम ने गांव की संपत्ति पर दावा नहीं किया, उसको भाइयों को देने का एलान किया। उन्होंने कहा कि मुंबई में भी जो कुछ कमाया है, उस पर भाइयों का अधिकार है। लौटने का उद्देश्य संपत्ति हासिल करना नहीं, बल्कि भाई-बहनों से मिलना था। कई बार ऐसे मामलों में विवाद होता है, रूपराम की सादगी ने स्नेह की मिसाल पेश की। हर ग्रामीण इसकी चर्चा कर रहा है।