बरेली। पारंपरिक, सामाजिक और पारिवारिक तरीकों से भगवान शिव के जश्न को दर्शाते नाटक तांडव का मंचन रविवार को एसआरएमएस के रिद्धिमा में रुबरू थिएटर ग्रुप की ओर से मंचन किया गया। नाटक का संदेश है कि जब तक हम खुद को पूरी तरह से पहचान नहीं पाते, तब तक हम सच्चे सुख और संतोष को नहीं पा सकते। दुनिया में दौलत और पहचान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने भीतर के सत्य को समझें और उसे अपनाएं।
तांडव नृत्य ही है जो सभी पात्रों को भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से जोड़ता है। नाटक में पारिवारिक मूल्यों के माध्यम से दर्शकों को जोड़ने का प्रयास किया गया है। मुख्य पात्र भवानी (मां), माधव (पुत्र) और मृगनयनी के इर्द-गिर्द कहानी घूमती है। उनके रिश्तों के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है। मृगनयनी नृत्य को लेकर भावुक है और इसी में पारंगत होकर अपना स्थान बनाना चाहती है। वह माधव को नृत्य सीखने की चुनौती देती है। माधव अपनी मां भवानी से नृत्य सीखने का आग्रह करता है। पारिवारिक दबाव में नृत्य करना छोड़ चुकी भवानी बेटे के प्यार के आगे झुक जाती है और उसे तांडव सिखाती है। नृत्य में पारंगत होकर माधव अब मृगनयनी की तलाश करता है और उसे राजा के दरबार में नृत्य करते हुए पाता है। यह देख माधव टूट ताजा है और यात्रा पर निकल जाता है। वहीं मृगनयनी को एहसास होता है कि उसकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ गई है। नाटक में मृगनयनी और माधव को एक दूसरे के पूरक दिखाए गए हैं। नाटक के दौरान चेयरमैन देवमूर्ति, आदित्य मूर्ति, उषा गुप्ता, गुरू मेहरोत्रा, डा. प्रभाकर गुप्ता आदि मौजूद रहे। संवाद