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इतना बड़ा अस्पताल.. सुभाषनगर का नाम सुनकर डर गया

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जिला अस्पताल में लगी मरीजों की लाइन। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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दोनों किडनी खराब होने के बाद भी डायलिसिस के लिए आए बुजुर्ग को अस्पताल से निकाला, रेलवे अस्पताल ने किया था रेफर
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प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने भी नहीं सुना तो वापस घर ले गए परिजन

बरेली। सरकार और जिला प्रशासन निजी अस्पतालों की मदद से कोरोना से लड़ने की योजना बना रहे हैं मगर अभी से हाल यह है कि मंगलवार को शहर के एक नामचीन अस्पताल से एक बुजुर्ग को डायलिसिस के लिए भर्ती करने से इनकार कर सिर्फ इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि वह सुभाषनगर से आए थे। गंभीर रूप से बीमार होने के बावजूद बुजुर्ग को भर्ती न करने पर परेशानहाल परिजन पहले जिला अस्पताल और फिर डीएम के बंगले पर भी पहुंचे लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई तो प्रशासन के कंट्रोल रूम में शिकायत दर्ज कराकर घर लौट गए।
दरअसल सुुुभाषनगर में एक युवक और उसके परिवार के लोग कोरोना संक्रमित मिले हैं। आम लोगों में तो इसकी दहशत है ही लेकिन एक नामी अस्पताल का प्रबंधन भी मंगलवार को सुभाषनगर के एक बुजुर्ग को भर्ती करने से कन्नी काट गया। सुभाषनगर की अनाज मंडी में रहने वाले रेलवे के रिटायर कर्मचारी राजीव प्रसाद तिवारी कैंसर पीड़ित हैं और उनकी दोनों किडनी भी खराब हैं। उनका इलाज गाजियाबाद के एक हॉस्पिटल में चल रहा है। घर वाले कुछ दिन पहले उन्हें गाजियाबाद से ले आए थे। बेटे मनीष तिवारी ने बताया कि मंगलवार को उन्हें इज्जनगर रेलवे हॉस्पिटल में दिखाया गया तो वहां से उन्हें डायलिसिस के लिए एक निजी अस्पताल में रेफर कर दिया गया। इसके बाद वह पिता को लेकर अस्पताल पहुंचे तो पहले तो उन्हें अंदर बुला लिया गया लेकिन जैसे ही स्टाफ को मालूम हुआ कि वह सुुुभाषनगर से आए हैं तो उन्हें फौरन बाहर निकाल दिया गया।
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मनीष तिवारी का कहना है कि अस्पताल स्टाफ ने इसके बाद परिसर को सैनिटाइज भी किया। उनसे कहा कि पहले कोरोना की जांच कराओ, उसके बाद ही भर्ती करेंगे। जिला अस्पताल में उन्हें यह कहकर वापस कर दिया गया कि लक्षण मिलने के बाद ही कोरोना की जांच होगी। वह इसके बाद डीएम आवास पर भी गए लेकिन वहां भी कोई सुनवाई नहीं हुई। मायूस होकर परिवार रिटायर कर्मी को लेकर घर लौट आया जो अब जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैँ।

सुभाषनगर के नाम पर एंबुलेंस वाले की भी न

कैंसर पीड़ित पिता को सुभाषनगर में वापस लाने के लिए भी मनीष को काफी मशक्कत करनी पड़ी। उनका कहना है कि कोई एंबुुलेंस वाला सुभाषनगर जाने को तैयार नहीं हुआ। बाद में हॉस्पिटल से कुछ दूर घर आने के लिए एंबुलेंस वाले ने भी 600 रुपये ले लिए।

अफसर ने मदद के बजाय दिया कंट्रोल रूम का नंबर

मनीष तिवारी का कहना है कि उन्होंने एक सरकारी नंबर से अफसर को फोन मिलाया था लेकिन मदद के बजाय उन्होंने प्रशासन के कंट्रोल रूम का नंबर दे दिया। मनीष का कहना है कि सीएमओ दफ्तर के कंट्रोल रूम का नंबर कई बार मिलाने पर भी नहीं उठा।
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