बरेली कॉलेज के जंतु विभाग में जल्द ही जलीय जीवों के शुक्राणु को क्रायो-प्रिजर्वेशन तकनीक से संरक्षित करने और आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक पर शोध शुरू करेंगे। विभाग के डॉ. संदीप रघुवंशी ने बताया कि क्रायो-प्रिजर्वेशन तकनीक के तहत -196 डिग्री सेल्सियस तापमान पर लिक्विड नाइट्रोजन के साथ शुक्राणु को संरक्षित किया जाता है। इस शुक्राणु का एग से तकनीकी रूप से संलयन कराया जाएगा। प्राकृतिक वातावरण देकर आईवीएफ तकनीक से नए सीडलिंग पैदा होंगे। जंतु विज्ञान के शोधार्थी झींगों पर यह प्रयोग करेंगे। सीडलिंग को विकसित कर नदियों में छोड़ा जाएगा।
डॉ. रघुवंशी ने बताया कि वर्तमान में सी फूड के नाम पर झींगे की सर्वाधिक मांग है। शोध में बहगुल व भाखड़ा नदियों में मिलने वाले झींगों को शामिल किया जाएगा। सी फूड में झींगा सर्वाधिक प्रोटीनयुक्त आहार है, इसलिए शोध में इसे चुना गया है। यह प्रयोग एक तरह से झींगों की खेती करने जैसा है।
पहाड़ी मछलियों पर सफलतापूर्वक कर चुके हैं प्रयोग
डॉ. संदीप ने बताया कि पहाड़ों पर पाई जाने वाली साइजो थोरेक्स जैसी मछली की लुप्त होती प्रजाति के स्पर्म का क्रायो-प्रिजर्वेशन कर बाद आईवीएफ तकनीक से मछली के एग का फर्टिलाइजेशन कराया गया। इससे 42 प्रतिशत मछली के अंडे सफलतापूर्वक जी उठे। इसमें जिन सीडलिंग को जीवन मिला, उन्हें पानी में छोड़ा गया था। इसके बाद वे सामान्य रूप से जीने लगे।