अपने आप में एक मिसाल हैं मास्टर थान सिंह। शिक्षा विभाग में काम करते हुए न जाने कितने नौनिहालों को सुनहरे भविष्य की राह दिखाई और रिटायर हुए तो लोगों का आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज कर जीवन भर सेवा की ठान ली। दिन-रात वह मरीजों को देखने को तत्पर रहते हैं। न इलाज का पैसा लेते हैं, न दवाओं का। दवाओं का खर्च उनकी पेंशन और खेतीबाड़ी से निकलता है।
भुता के गांव डड़िया दौलतपुर गांव निवासी मास्टर थानसिंह 72 वर्ष के हो चुके हैं। आयुर्वेद में उनकी युवावस्था से ही दिलचस्पी थी। शिक्षा के पेशे में रहते हुए भी वह आयुर्वेद का ज्ञान अर्जित करते रहे। वैद्य विशारद और आयुर्वेद रत्न की डिग्री हासिल की। स्कूल की छुट्टी के बाद मरीजों को देखने लगे। धीरे-धीरे उनका अनुभव बढ़ा और उनके पास आने वाले मरीजों की संख्या भी। रिटायरमेंट के साथ इकलौती बेटी शकुन का विवाह करके सारी जिम्मेदारियों से फारिग हुए तो पूरी तक जरूरतमंदों की सेवा को जीवन समर्पित कर दिया। अब सुबह से शाम तक लोग उनसे दवा लेने पहुंचते हैं। यह सिलसिला कई सालों से चल रहा है।