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सात समंदर पार से खींच लाई देश की माटी की खुशबू

Sat, 07 Feb 2015 01:47 AM IST
बरेली
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गांव के बुजुर्ग मदन सिंह यादव ने अपने पुरखों से मिली जानकारी का जिक्र करते हुए उन्हें एक कुआं दिखाया। उन्होंने बताया कि इसके पास टीले पर कभी कोमल सिंह का मकान हुआ करता था। गांव में सिर्फ यही एक चौधरी परिवार था, जिसके पास जमीन थी। अंग्रेजों ने ब्रिटिश गुयाना की बंजर जमीन को आबाद करने के लिए देश के तमाम अन्य लोगों के साथ कोमल सिंह को भी वहां भेज दिया। विदेश भेजे जाने के डर से कई परिवार गांव छोड़कर चले गए। इनमें चौधरी परिवार भी था, जो कहां गया, पता नहीं। उन्होंने बताया कि शायद विदेश भेजने से पहले कोमल की शादी हो चुकी थी। गुयाना में उन्होंने दूसरी शादी की। केली लक्ष्मी के अनुसार वहां कोमल सिंह की पांच संतानें हुईं। तीन बेटियां और दो बेटे। इनमें सबसे बड़े भगवंती सिंह  की संतानें वह खुद हैं। आज गुयाना में बड़ी आबादी भारतीय परिवारों की है। पीढ़ी दर पीढ़ी उनकी आबादी बढ़ती जा रही है। अपनी जड़ों से कटने के बाद भी भारतीय होने का अहसास उनमें कायम है, इसलिए वह अपने नाम भारतीय ही रखते हैं।
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इंसेट...
इमीग्रेशन सर्टिफिकेट बना जरिया
केली लक्ष्मी चढ्ढी के पास उनके दादा को ब्रिटिश हुकूमत की ओर से माइग्रेट करने का इमीग्रेशन सर्टिफिकेट है। इसमें लिखा है कि कोमल सिंह को नौ अक्टूबर 1879 को एलोरा शिप के जरिए 8 मार्डन रीच, कोलकाता से गुयाना भिजवाया गया था। उस वक्त उनकी उम्र 28 साल थी। इसी सर्टिफिकेट पर कोमल का यहां का पता लिखा है। यह सर्टिफिकेट लेकर केली ने द रूट्स संस्था के संयोजक ज्ञानेश कमल से संपर्क किया, जो विदेशों में बसे भारतीयों को यहां उनके मूल स्थानों से जोड़ने के लिए लखनऊ में काम कर रहे हैं। दोनों ज्ञानेश के साथ ही बरेली आए और यहां सदर कैंट में बंटी बेदी के आवास पर ठहरे।
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लेकिन गांव में नहीं रहना चाहते
सुंदर सिंह से जब यह सवाल किया कि क्या वह अपने पूर्वजों के गांव रम्पुरा में रहना चाहेंगे तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया। उन्हें गांव के पिछड़ेपन को देखकर अफसोस हुआ। लंदन में प्रोफेशनल सोशल वर्कर 50 वर्षीय सुंदर ने कहा कि गुयाना आज काफी विकसित है। वहां की जीवन शैली यहां से बहुत बेहतर है, इसलिए उनका यहां रहना असंभव है। हालांकि उन्होंने कहा कि वह पांच-सात साल बाद रम्पुरा में फिर आना पसंद करेंगे।
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कहां गिरा था झुमका!
भारत के प्रति गहरा लगाव होने की वजह से 70 वर्षीय केली लक्ष्मी थोड़ी-बहुत हिंदी भी बोल-समझ लेती हैं। यहां के फिल्मी गीत सुनने का उन्हें बेहद शौक है। वह बताती हैं कि 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गुयाना गई थीं, तब उन्होंने पहली बार गाना सुना था- झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में...।  बरेली आने पर पूछ बैठीं कि यह झुमका कहां गिरा था, वह जगह दिखाओ। उन्होंने कहा कि गुयाना में यह जानकर अच्छा लगा था कि प्रियंका चोपड़ा भी बरेली की हैं। केली न्यूयार्क यूनिवर्सिटी से सीनियर एकाउंटेंट रही हैं।
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