बरेली। शहर का स्मार्ट बनने का सपना चकनाचूर हो गया। प्रथम चरण में 20 स्मार्ट शहरों की सूची से बरेली बाहर हो गया। अफसरों के स्मार्ट सिटी का तमगा दिलवाने के सारे दावे हवा हो गए। यूपी से कोई भी शहर प्रथम चरण में न लिया जाना आमजन को आश्चर्यचकित कर गया। अफसर अब इसका ठीकरा ऑनलाइन पब्लिक वोटिंग में कमी पर फोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। देश भर से मिले स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट में बरेली का प्रोजेक्ट 88 वें नंबर पर है। बरेली को स्मार्ट सिटी के अगले चरण में शामिल होने के लिए कम से कम तीन साल इंतजार करना होगा।
केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने गुरुवार को प्रथम चरण में देश भर में स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित किए जाने वाले 20 शहरों की सूची की घोषणा की। इसमें बरेली समेत यूपी से कोई भी शहर शामिल न होना राजनीतिज्ञों के साथ आम जनता को भी हैरान कर गया। स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट में तीन विकल्प (रेट्रोफिटिंग, रिडवलपमेंट और ग्रीनफील्ड) दिए गए थे। नगर निगम ने कंसल्टेंट एजेंसी की मदद से बीडीए की रामगंगा नगर में 670 एकड़ आवासीय जमीन पर नया स्मार्ट सिटी बसाने के लिए तीसरे विकल्प ग्रीन फील्ड को चुना। कंसल्टेंट एजेंसी ने आम जनता की राय लेने के लिए तीन वर्कशाप कराई। इसमें बुनियादी सुविधाओं पर जनता ने अपनी राय रखी। ऑनलाइन पोल में भी 47 हजार से ज्यादा मतदाताओं ने वोट डालकर अपने शहर को स्मार्ट बनाने के सुझाव दिए। दो महीने तक चली लंबी कवायद के बाद रामगंगा नगर में स्मार्ट सिटी बसाने के लिए 4158 करोड़ का प्रोजेक्ट बनाकर केंद्र को भेजा गया। यूपी से 12 शहरों को स्मार्ट बनाने के प्रोजेक्ट केंद्र सरकार को भेजे गए थे लेकिन इनमें बरेली समेत कोई भी शहर प्रथम 20 में शामिल नहीं हो सका। मेयर और नगर आयुक्त समेत कंसल्टेंट एजेंसी ने भी प्रथम चरण में बरेली को स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल होने के दावे किए थे लेकिन सब हवा हवाई साबित हुए। कंसल्टेंट एजेंसी ने प्रोजेक्ट बनाने में दो करोड़ रुपये खर्च किए जो बरेली के 88 वें नंबर पर आने के बाद पानी में बहते नजर आ रहे हैं।
प्रोजेक्ट में कहां रहीं खामियां
1- जनसंख्या के अनुपात में पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं (बिजली, पानी और सड़क) का अभाव
2- शैक्षिक पिछड़ापन और शिक्षा के संसाधन उपलब्ध न होना
3- शहर में रोजगार उपलब्ध होने के साधन न होना
4- प्रतिदिन कूड़ा उठाने और निस्तारण के संशाधन न होना
5- शहर के विकास के लिए बजट खर्च की पर्याप्त प्लानिंग न बना पाना
6- बड़ी कंपनियों के इन्वेस्टमेंट की संभावनाओं में कमी
7- प्रत्येक नागरिक खासतौर से महिलाओं की सुरक्षा का अभाव
8- सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट का न चलना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहतर नहीं
9- आईटी कनेक्टिविटी और डिजिटलाइजेशन विकसित न होना
10- सरकारी विभागों में पुराने ढर्रे पर कामकाज
अब अपनी ढपली अपना राग...
फोटो- (मेयर डा. आईएस तोमर)
‘ये यूपी और बरेली का दुर्भाग्य है। हमने बहुत अच्छा प्रोजेक्ट बनाया था। रामगंगा नगर में 4158 करोड़ से बसने वाले स्मार्ट सिटी में केंद्र सरकार को केवल पांच सौ करोड़ रुपये देने थे। बाकी बजट के इंतजाम की प्लानिंग भी बेहतर तरीके से की गई। हमें उम्मीद थी कि संतोष जी केंद्र में मंत्री हैं तो बरेली का चयन प्रथम चरण में हो जाएगा मगर, निराशा हाथ लगी। ’ डा. आईएस तोमर,
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‘हम अपने शहर के प्रोजेक्ट को बेहतर तरीके से नहीं रख पाए। केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार अपनी सरकार में वैसे ही दबकर बात करते हैं। जब आप ठीक से अपनी बात नहीं रख पाएंगे तो ऐसे ही नतीजे सामने आएंगे। प्रथम चरण में न आ पाने में मेयर, नगर आयुक्त से लेकर सबकी कमी रही।’ राजकुमार अग्रवाल, प्रथम मेयर
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‘केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी के मानक तय किए थे। इसमें सबको मिलकर काम करना चाहिए था। अन्य शहरों के मुकाबले बरेली पहले से ही पिछड़ा है लेकिन हम बेहतर काम करके प्रोजेक्ट को और अच्छा बना सकते थे। प्रोजेक्ट बनाने में लापरवाही बरतने से बरेली दौड़ से बाहर हो गया।’ सुभाष पटेल, पूर्व मेयर
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‘स्मार्ट सिटी का हमारा प्रोजेक्ट बेहतर था। इसमें पूरी मेहनत की गई। हमें प्रथम चरण में बरेली के शामिल होने की पूरी उम्मीद थी लेकिन पता नहीं केंद्र सरकार ने चयन के कौन से मानक रखे। हमें बरेली के पहली सूची से बाहर होना समझ में नहीं आ रहा है।’ शीलधर सिंह यादव, नगर आयुक्त
‘संतोष जी ने बरेली की जनता के लिए छह बार जीतने के बाद कोई काम नहीं कराया। सातवीं बार भी जनता उनसे किसी काम की उम्मीद न करे। वह सांप्रदायिकता से मतदाताओं में भ्रम फैलाकर चुनाव जीते तो उनको विकास से कोई मतलब नहीं है। मेरे कार्यकाल में कराए गए काम भी रुकवा दिए हैं तो स्मार्ट सिटी में बरेली को शामिल करने का अपनी सरकार पर दबाव कैसे बनाते।’ प्रवीण सिंह ऐरन, पूर्व सांसद
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‘केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट के प्रेजेंटेशन के आधार पर स्मार्ट शहरों की सूची जारी की है। हमारा प्रजेंटेशन कहीं न कहीं कमजोर था। हम अब भी सरकार और संगठन में उच्च स्तर पर बरेली को स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल करने की बात रखेंगे। उम्मीद है कि हमारी बात सुनी जाएगी।’ डा. अरुण कुमार, विधायक
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‘स्मार्ट शहरों का चयन राजनीतिक आधार पर किया गया है। केंद्र सरकार ने यूपी के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार किया है। भाजपा के नेताओं को पता है कि आगामी विधानसभा चुनाव वह जीतने वाले नहीं हैं। इसलिए यूपी से कोई शहर नहीं लिया। जनता चुनाव में सबक सिखाएगी।’ वीरपाल सिंह यादव, पूर्व सांसद सपा
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‘हम पहले जानते थे कि स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट केंद्र सरकार के सामने औंधे मुंह गिरेगा। बरेली को स्मार्ट शहर बनाने के बजाय रामगंगा नगर जैसे गांव को स्मार्ट बनाने के लिए प्रोजेक्ट बनाया गया। यूपी सरकार शहरों में विकास के कोई काम नहीं कर रही। बरेली समे यूपी से कोई शहर का न चुना जाना सपा सरकार के साथ-साथ मेयर और नगर आयुक्त भी जिम्मेदार हैं।’
विकास शर्मा, नेता भाजपा पार्षद दल
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‘यूपी से 73 सांसद जिताने वाले यूपी में केंद्र की भाजपा सरकार को कोई ऐसी खासियत नहीं दिखी जिसको स्मार्ट बनाने की सोचते। 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता को भाजपा से इसका हिसाब किताब बराबर करना चाहिए।’
राजेश अग्रवाल, नेता सपा पार्षद दल
स्मार्ट सिटी के मानक में बरेली यहां पिछड़ गया
1- पेयजल सप्लाई- 11 लाख की जनसंख्या को प्रतिदिन पर्याप्त पानी की आपूर्ति नहीं हो पा रही। कंसल्टेंट एजेंसी ने प्रोजेक्ट में इस बात का जिक्र किया। जलनिगम से बनाए गए 17 ओवरहेड टैंक और 29 नलकूपों के अलावा नई पाइप लाइन भी पेयजल की आपूर्ति नहीं हो पा रही।
2- बिजली सप्लाई - स्मार्ट बनने के लिए 24 घंटे बिजली आपूर्ति के अलावा एलईडी के मानक हैं। नगर निगम इनमें किसी भी मानक को पूरा नहीं कर पाया।
3- सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट- कानूनी अड़चनों के चलते दो साल से सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट बंद चल रहा है। कूड़ा निस्तारण के इंतजाम नहीं हैं। शहर से प्रतिदिन रोजाना निकलने वाले 350 मीट्रिक टन कूड़े को शहर में विभिन्न स्थानों में डालने से गंदगी और प्रदूषण की समस्या है।
4- पब्लिक ट्रांसपोर्ट - शहर के अंदर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत बेहद खराब है। मुख्य मार्गों पर अतिक्रमण के चलते जाम की समस्या रहती है। सिटी बसें चलाने के लिए मार्ग अतिक्रमण मुक्त नहीं हैं। शहर का यातायात आटो और टैंपो पर निर्भर है।
5- आईटी कनेक्टिविटी और डिजिटलाइजेशन- नगर निगम के दैनिक कार्यों से लेकर सफाई की मानीटरिंग, डोर टू डोर कूड़ा, जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र ऑनलाइन नहीं बनते। आईटी कनेक्टिविटी और डिजिटलाइजेशन सिर्फ फाइलों में हैं।
6- गुड गर्वेंनस- सरकार की विकास योजनाओं में जनता की सहभागिता न के बराबर है। नगर निगम की योजना बोर्ड या कार्यकारिणी से मनमाने तरीके से स्वीकृत होकर जनता पर थोप दी जाती हैं। वार्डों में काम जरूरत के हिसाब से नहीं बल्कि राजनीतिक वजहों से पक्षपातपूर्ण कराए जाते हैं।
7- हेल्थ और एजुकेशन- बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा का अभाव है। सरकारी विद्यालयों में बच्चों के बैठने और अत्याधुनिक पद्धति से शिक्षा देने की व्यवस्था नहीं है। अस्पतालों में चिकित्सक और दवाइयां मरीजों के अनुपात में उपलब्ध नहीं।
8- स्मार्ट पार्किंग- स्मार्ट बनने के लिए शहर में स्मार्ट पार्किंग के मानक तय किए। गांधी उद्यान के नाम पर ले देकर एक पार्क है। बाकी पार्क बदहाल स्थिति में हैं। मार्गोँ पर फुटपाथ और ग्रीनबेल्ट का भी अभाव है।
9- सुरक्षा- ऑनलाइन वोटिंग में सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा था। 47 फीसदी मतदाताओं ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी थी। महिलाओं, बच्चों और आम नागरिकों की सुरक्षा के इंतजाम न होने की वजह से भी बरेली स्मार्ट सिटी की दौड़ में पिछड़ गया।