बरेली। नगर निगम में दो तरह के ऑडिट होते हैं। एक आंतरिक और दूसरा बाह्य। आमदनी और खर्च से जुड़ा आंतरिक ऑडिट महानगर लेखा परीक्षक (एमएनएलपी) करते हैं जबकि बाह्य ऑडिट इलाहाबाद से लेखा विभाग के ऑडिटर करते हैं। एकाउंट ऑडिट का प्रत्येक छह माह में लेखा परीक्षण जरूर किया जाता है लेकिन उसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की जाती। जनता को ऑडिट रिपोर्ट बताने में भी स्मार्ट बनने की जरूरत है। तभी जनहित में कराए जाने वाले काम और उनकी पारदर्शिता का आकलन हो सकेगा।
केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन में शहरों को शामिल करने के लिए 13 मानक तय कर रखे हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण हर माह पारदर्शी तरीके से किया जाने वाला एकाउंट ऑडिट है। नगर निगम बोर्ड में प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ होने से पहले रखे जाने वाले बजट में ऑडिट खर्च 20 लाख से अधिक दर्शाया जाता है। लेखा विभाग के मुताबिक एकाउंट ऑडिट के प्रत्येक माह बनने वाले ट्रायल बैलेंस की जांच चार्टर्ड एकाउंटेंट करते हैं। इसके बदले नगर निगम से उनको निश्चित फीस भुगतान की जाती है। प्रत्येक छह माह में इलाहाबाद लेखा विभाग की टीम आमदनी और खर्च के मदों का लेखा परीक्षण करती है। ऑडिट रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताएं होने पर आपत्तियां भी की जाती हैं। नगर निगम कभी भी ऑडिट रिपोर्ट न बोर्ड में और न ही अन्य तरीके से सार्वजनिक करता है। गंभीर आपत्तियों का निस्तारण गोपनीय तौर पर चलता रहता है। अगर इसमें कोई अफसर या कर्मचारी फंसा दिखता है तो उस फाइल को दबा दिया जाता है। शासन जिन ऑडिट आपत्तियों का संज्ञान लेता है उनका निस्तारण भी समय सीमा के अंदर नहीं हो पाता। स्मार्ट सिटी के लिए ऑडिट आपत्तियों का निस्तारण समय सीमा के अंदर होने के साथ उसमें पारदर्शिता भी जरूरी है।
क्या कहते हैं जनप्रतिनिधि और व्यापारी
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‘अगर हम स्मार्ट बनना चाहते हैं तो हमें विभिन्न मदों में होने वाली आमदनी से लेकर खर्च करने के तरीके में सुधार करना होगा। प्रत्येक योजना अफसरों की देखरेख में विभिन्न विभागों से मिलकर बने। उस पर समय बद्ध अमल हो। काम की गुणवत्ता मानक के अनुरूप हो।’ विपुल, कंप्यूटर व्यापारी
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‘ऑडिट कराना या न कराना नगर निगम का काम है। पब्लिक को इससे क्या मतलब। चाहे आप ऑडिट कराएं या न कराएं। जनता के लिए तो पेयजल सप्लाई, सड़क और नाली निर्माण के काम ठीक हों। बरसात में जलभराव न हो। टैक्स ठीक से लिया जाए।’ शशांक अग्रवाल, इलेक्ट्रिक व्यापारी
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‘एकाउंट ऑडिट वित्तीय लेखा जोखा रखने के लिए है। ये तो अब प्रत्येक संस्था के लिए जरूरी है। नगर निगम भी इससे अलग नहीं है। सवाल ये है कि शासन से मिलने वाले बजट और स्थानीय आमदनी का जनहित में कितना उपयोग होता है। ये चीज स्मार्ट होनी चाहिए।’ अनुराग जैन
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‘बारिश में जलभराव न हो। सफाई कर्मचारी नियमित गली मोहल्लों की सफाई करें। पानी समय से पहुंचे। सड़कों पर अंधेरा न रहे। सड़क और नाली निर्माण के काम समय से पूरे हों। सबको सीवर सुविधा मिले। प्रत्येक काम ऑनलाइन किए जाएं। ये चीजें भी स्मार्ट बनने में मदद करेंगी।’ सतीश कुमार, समाजसेवी
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‘सामान्य व्यक्ति को ऑडिट से क्या मतलब। आमदनी और खर्च का एकाउंट ऑडिट कराना नगर निगम के अफसरों का काम है। हम तो ये जानते हैं कि आप हमसे टैक्स ले रहे हैं तो हमें स्मार्ट सुविधाएं दीजिए। सरकार के बजट का सद उपयोग किया जाए। वित्तीय अनियमितताएं न हों। इससे भी स्थिति सुधरेगी।’ साहिबे आलम, एथलेटिक कोच
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‘एकाउंट ऑडिट जनता का विषय नहीं है। ये सोचना अफसरों का काम है कि वह ऑडिट कब कराएं। उसमें आयी आपत्तियों का निस्तारण समय से करें। नगर निगम टैक्स वसूली से लेकर आमदनी के मदों में वसूली और खर्च करने के कामों की पारदर्शिता सुनिश्चित कर ले तो समझो हम हो गए स्मार्ट।’ संजू देवल, व्यापारी