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आधे शहरियों को जलाएगा और लंबा भी नहीं चल पाएगा स्मार्ट सिटी

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बरेली। स्मार्ट सिटी के नाम पर पहले से ही विकसित शहर के सिविल लाइंस इलाके पर नगर निगम करीब 2200 करोड़ रुपये का भारी भरकम बजट खर्च करने की तैयारी में है। वहीं, पुराना शहर जैसे अन्य इलाकों के लोग मूलभूत सुविधाओं को भी तरस रहे हैं। यही वजह है कि शहर के पूर्व मेयर राजकुमार अग्रवाल और डॉ. आईएस तोमर भी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को धरातल पर खरा नहीं मानते। उनका कहना है कि पहले से ही उपेक्षित इलाके को नजरअंदाज कर सिविल लाइंस जैसे पॉश इलाके को विकसित करने से शहरवासियों के मन में सिस्टम को लेकर खाई पैदा हो जाएगी। वहीं, भारी भरकम बजट खर्च करके बनाए जा रहे प्रोजेक्ट का पांच साल बाद रखरखाव करना भी मुश्किल होगा। उदाहरण देते हुए पूर्व मेयर राजकुमार अग्रवाल ने कहा कि परसाखेड़ा में झुमका लगाया जा रहा है जबकि मैकेनियर रोड टूटी पड़ी है। अफसरों को सोचना चाहिए कि जनता की पहली जरूरत झुमका है या सड़क।
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स्मार्ट सिटी से होने वाले प्रमुख कार्य और बजट
हैंडीक्राफ्ट सेंटर : 211 करोड़ से जिला उद्योग केंद्र के पास बनेगा और यहां बरेली के जरी-जरदोजी, फर्नीचर उद्योग के उत्थान के लिए ट्रेनिंग सेंटर, प्रदर्शन और बिक्री का इंतजाम होगा।
कामर्शियल कॉम्प्लेक्स : 170 करोड़ से संजय कम्युनिटी हॉल, तालाब और एलन क्लब को मिलाकर बनेगा। यहां मनोरंजन, खानपान, घूमने और ऑडिटोरियम होगा।
चौराहों का विकास और पैदल पुल : चौकी चौराहा, पटेल चौक और गांधी उद्यान समेत छह चौराहों पर रोटरी और सौंदर्यीकरण होगा। जिला अस्पताल और गांधी उद्यान पर दो पैदल पुल भी बनेंगे।
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सॉलिड वेस्ट : 50 करोड़ की लागत से चार कूड़ा कलेक्शन सेंटर बनेंगे और बाकरगंज के कूड़े निस्तारण होगा।
स्टेडियम : 20 करोड़ से स्पोर्ट्स स्टेडियम में ही मिनी स्टेडियम बनेगा और वहां स्वीमिंग पूल, बैडमिंटन कोर्ट का नवीनीकरण होगा।
कमांड एंड कंट्रोल सेंटर : 283 करोड़ से नगर निगम परिसर में ट्रैफिक, सीसीटीवी से निगरानी समेत अन्य कार्यों के लिए कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बनेगा।
सोलर : सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए सोलर ट्री और सभी सरकारी विभागों की छत पर सोलर पैनल।
स्मार्ट क्लास एवं ओपन जिम : सिविल लाइंस के छह करोड़ से नौ स्कूलों में 30 स्मार्ट क्लास, 7.6 करोड़ से दर्जन भर पार्कों में ओपन जिम।

सिविल लाइंस ही शहर नहीं, पिछड़े इलाकों की और कितनी दुर्दशा की जाएगी
दिल्ली के विज्ञान भवन में 24 जून 2015 को स्मार्ट सिटी की लांचिंग हुई थी। इसमें सभी मेयर और नगर आयुक्त भी बुलाए गए थे, जिनमें मैं भी शामिल था। मैंने तभी इस पर आपत्ति जताई थी कि यह हाई-फाई बातें हैं, जो अमेरिका जैसे देशों के लिए हैं क्योंकि इस प्रोजेक्ट में न तो स्वच्छता पर बात हुई और न ही सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पर। हमने यह भी कहा कि अगर शहर का एक क्षेत्र ही विकसित किया गया तो जनता में वैमनस्यता उत्पन्न होगी। मेरी राय थी कि हर शहर के लिए ड्रेनेज, एसटीपी और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का इंतजाम किया जा ताकि गंगा साफ हो सके। क्योंकि आने वाले समय में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता और कूड़ा बड़ी समस्या होगी। मगर स्मार्ट सिटी के नाम पर पब्लिक से धोखा किया जा रहा है। पहले से ही विकसित सिविल लाइंस को और ज्यादा विकसित करने पर जोर है। भारी भरकम खर्च करके वर्टिकल गार्डन जैसी जो योजनाएं लाई जा रही हैं, पांच साल बाद उन्हें दुरुस्त रखना भी मुश्किल हो जाएगा। पुराना शहर के अति पिछड़े इलाके लगातार पिछड़ते ही जा रहे हैं। टैक्स जब पूरा शहर दे रहा है तो स्मार्ट सिटी सिविल लाइंस ही क्यों बनेगा, इसका लाभ भी पूरे शहर को मिलना चाहिए।
- डॉ. आईएस तोमर, पूर्व मेयर

22 सौ करोड़ के बगैर भी बन सकता है स्मार्ट सिटी, अफसर तो सिर्फ पैसा फूंक रहे हैं
शासन कागजी पॉलिसी बना रहा है, स्मार्ट सिटी भी उसका उदाहरण है, जिसके लिए अफसर मनमानी पर आमाद हैं। शहर के सबसे पॉश इलाके रामपुर गार्डन की सड़कों पर गड्ढे हैं। सच बात तो यह है कि स्मार्ट सिटी चल ही नहीं पा रहा है। इसके बहाने सरकारी धन का सदुपयोग करने के बजाय उसे खपाने की कोशिशें हो रही हैं। जबकि अफसरों को रुपये फूंकने के बजाय विकास कार्यों पर खर्च करना चाहिए। ठेले खोमचे वालों को हटाने से स्मार्ट सिटी नहीं बन सकता। नगर निगम के अफसर स्टेडियम रोड को जाकर देखें रेता-बजरी से लेकर पक्के कब्जे तक सड़क की जमीन पर हो गए हैं। मगर बीडीए और नगर निगम के अफसरों को यह कब्जे नजर नहीं आते। अफसर बताएं कि परसाखेड़ा में जीरो प्वाइंट पर झुमका लगना ज्यादा जरूरी था या बरसों से उखड़ी पड़ी थाना प्रेमनगर के सामने वाली मैकेनियर रोड बनानी जरूरी थी। सिविल लाइंस तो वैसे ही प्रमुख जगह है, शहर के अन्य हिस्सों में भी तो विकास होना चाहिए। अफसर कभी ध्यान दें गांधी उद्यान से डेलापीर जाने वाली सड़क पर कितने गड्ढे हैं। पुल के पास कुछ सड़क चौड़ी करने से पूरी रोड दुरुस्त नहीं हो जाती।
- राजकुमार अग्रवाल, पूर्व मेयर

पार्षदों की बात
जरी जरदोजी के नाम पर बरेली का स्मार्ट सिटी में चयन हुआ है लेकिन पुराना शहर के जिन इलाकों में सबसे ज्यादा कारीगर रहते हैं, वहां विकास कार्य ही नहीं किए जाते। नगर निगम में जितने कामों के प्रस्ताव दिए, उनमें दस प्रतिशत भी पूरे नहीं हुए।
- रईस मियां अब्बासी, पार्षद हजियापुर
टैक्स पूरे शहर की जनता देती है, स्मार्ट सिटी वहां बना रहे हैं, जहां सिर्फ बड़े लोग और अफसर रहते हैं। हमारे वार्ड के तमाम इलाके में न तो सीवर लाइन है और न ही पानी आता है। कूड़े के भी जगह-जगह ढेर लगे हुए हैं, सफाई कर्मचारी भी कम कर दिए।
- कमरुल निशां, पार्षद चक महमूदनगर
हमारे लिए तो स्मार्ट सिटी हमारा वार्ड है, जो उसमें शामिल ही नहीं है। साल भर से वार्ड में कोई विकास कार्य शुरू नहीं हुआ। पिछले नगर आयुक्त के कार्यकाल में संपवेल मंजूर भी हुआ था, जमीन के नाम पर अब उसमें भी अड़ंगा लगा दिया गया है।
- अजय चौहान, पार्षद शांति विहार
पहले से ही चमचमा रहे क्षेत्र को स्मार्ट सिटी में शामिल किया है। पिछड़े इलाकों की ओर से किसी का ध्यान नहीं है। पिछले एक साल में मेरे वार्ड में कोई विकास कार्य मंजूर नहीं हुआ है। पूर्व में स्वीकृत कराए गए काम भी अब तक पूरे नहीं हो सके हैं।
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- मुनेंद्र यादव, पार्षद मढ़ीनाथ
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