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साक्षात्कार: बरेली के बाजार और झुमके से रूबरू होकर आया करार, गायक सुखविंदर सिंह ने बयां किए जज्बात

Sat, 08 Mar 2025 10:15 PM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

सार

मशहूर गायक सुखविंदर सिंह शनिवार को एक लाइव म्यूजिक शो के लिए बरेली पहुंचे। उन्होंने यहां एक निजी होटल में अमर उजाला से खास बातचीत की। 
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मशहूर गायक सुखविंदर सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में... यह गाना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यही वजह थी कि बरेली आने, शो करने और झुमके से रूबरू होने का बहुत मन था। मौका मिला तो तुरंत लपक लिया। शनिवार को एक लाइव म्यूजिक शो के लिए बरेली आए मशहूर गायक और चार दशक में करीब आधा दर्जन भाषाओं में गाने गा चुके सुखविंदर सिंह से अमर उजाला ने विशेष बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...।

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सवाल: आपका हालिया एल्बम नागिनी काफी चर्चा में है। यह अब तक के गानों से किस तरह अलग है?
जवाब: यह एक फिक्शन है। मैं एक शो के लिए सैनफ्रांसिस्को गया था। वहां से मैक्सिको जाना हुआ। वहां काउ बॉय के एक क्लब में गया। उनको बताया गया कि यह जय हो... का गायक है। उस समय पता चला कि वहां हिंदी गाने सुने जाते हैं। वहां काफी भारतीय हैं। वहां मुझसे एक गाने की फरमाइश की गई। मैंने मानसून वेडिंग का कावा कावा... गाया तो सारा क्लब नाच उठा। इसी माहौल पर नागिनी को बनाने का विचार आया। इस गाने की खूबी बैकग्राउंड विदेशी और गाना देसी होना है।

सवाल:  पिछले वर्षों की तुलना में आपके काम में अब क्या बदलाव आया है?
जवाब: लाइव कंसर्ट बढ़े हैं। मैंने खुद के शो के तरीके को बदला है। मैं स्टेज से कुछ नहीं बोलता हूं। मैं गाकर ही अपनी बात कहता हूं। अभी छह एल्बम बनाने पर काम चालू है। इसमें शहीदों को युवाओं के दिल में जिंदा करने से लेकर बच्चों में खाने की अच्छी आदतें शामिल कराना जैसे विषय रहेंगे। बच्चों के लिए खास इस एल्बम का नाम है- गुड मॉर्निंग

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सवाल:  आजकल इंफ्लूएंसर्स, बॉलीवुड कलाकारों में कंट्रोवर्सी वाले बयान देकर चर्चा में आने की होड़ मची है, यह कितना सही है?
जवाब: मेरा मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म में भी सेंसरशिप लानी चाहिए। कोई गलत बोलकर चर्चा में आ जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए।

सवाल: बरेली में आप पहली बार आए हैं, कैसा अनुभव रहा?
जवाब: (गाना शुरू) झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में...। आपको मालूम है कि बरेली में हूं तो आज का मेरा सोशल मीडिया पोस्ट ही यही गाना है। बरेली रात के समय पहुंचा तो डमरू चौराहे से गुजरा। वहां गाड़ी रुकवाई और फोटो खिंचवाने के लिए घुस गया। ट्रैफिक कांस्टेबल ने मेरी फोटो खींच ली। (हंसते हुए) बाद में उसने मुझे पहचान लिया तो जाने भी दिया। मैंने तो सोचा था कि डमरू के संग सेल्फी तो लूंगा, चाहे सजा हो जाए। यहां तो झुमका भी है और आंखों का सुरमा भी।

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संघर्ष ही जीवन है, आज भी सीख रहा
वर्ष 1993 में कॅरिअर की शुरुआत और इसके बाद संघर्ष से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि तब पहला गाना आजा सनम... और छैयां छैयां जैसी बड़ी हिट, जिंदगी में बहुत कुछ देखा। वर्ष 1993 में परीक्षा देने के बाद मैं घर से भाग निकला। तब मेरे असली संघर्ष की शुरुआत हुई। लक्ष्मीकांत से मुलाकात हुई तो उन्होंने गाना गवाया। आजा सनम... गाना हिट हुआ, फिल्म फ्लॉप। गाना रिकॉर्ड होने के कुछ दिन बाद ही लक्ष्मीकांत का निधन हो गया तो अनाथ जैसा महसूस हुआ। इसके बाद फिर संघर्ष शुरू। चेन्नई में एआर रहमान से मुलाकात हुई। वह छैयां छैयां का पंजाबी वर्जन कर रहे थे। उसी शाम को गाना रिकॉर्ड हो गया। यह गाना अब शाहरुख खान अपने बेटे की फिल्म में डाल रहे हैं। इसे फिर से रिकॉर्ड किया जाना है।

सीख जो जिंदगी को बेहतर बना रहीं
गुरु लक्ष्मीकांत ने कामयाब लोगों की संगत में रहने, वर्तमान में जीने और भूतकाल का आदर करने की सीख दी। चित्रकार एमएफ हुसैन से भी मिला। वह मेरे घर आए तो सफेद दीवारों पर रंगीन कलाकृतियां बना दीं। उनका कहना था कि रंग सफेद कैनवस पर ही खिलते हैं। इसी ने सिखाया कि सादगी में ही जीवन के रंग खिलेंगे।
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