गंभीर रूप से बीमार किसान को लेकर उसकी पत्नी और बेटा पैसा निकालने बैंक ऑफ बड़ौदा सहोड़ा ब्रांच पहुंचे। रकम की जरूरत इलाज के लिए थी। भीड़ अधिक थी सो जल्दी काम कराने के लिए मैनेजर की मिन्नतें कीं पर वह नहीं पसीजे। एक घंटे की मशक्कत के बाद उनकी इंसानियत जागी जरूर पर तब तक बाहर तेज धूप में तांगे पर पड़े किसान की मौत हो चुकी थी। घटना से गुस्साए ग्राहकों ने बैंक के बाहर जमकर हंगामा किया। किसान के परिवारवाले मौत की वजह बैंक स्टाफ की लापरवाही बताते रहे। मौके पर पहुंची पुलिस ने हंगामा कर रहे लोगों को समझाकर शांत कराया।
गांव औरंगाबाद के 60 वर्षीय रामलाल पुत्र डालचंद बीते 8-10 दिन से पेट में रसौली के दर्द और तेज बुखार से पीड़ित थे। हालत ज्यादा बिगड़ने पर शनिवार को इलाज के लिए बरेली ले जाने की योजना बनी। लेकिन, इसके लिए पैसे की जरूरत थी तो पत्नी रूपकली और बेटा मनोेज बीमार रामलाल को तांगे पर लिटाकर सात किमी दूर बैंक ऑफ बड़ौदा सहोड़ा ब्रांच से तीन हजार रुपये निकालने पहुंचे। पौने दस बजे रामलाल का तांगा बैंक गेट पर पहुंचा तो अंदर-बाहर ग्राहकों की भारी भीड़ थी। पत्नी रूपकली और बेटा मनोेज शाखा प्रबंधक अनुज गुप्ता से मिले और पिता की गंभीर बीमारी का हवाला देते हुए किसी कर्मचारी को बाहर भेजकर विड्राल फॉर्म पर दस्तखत करवाने और जल्द पेमेंट कराने की गुहार लगाई, लेकिन शाखा प्रबंधक नहीं पसीजे। कह दिया, यहां तो सभी जरूरतमंद ही आते हैं, थोड़ा सब्र करो। बताते हैं कि मां-बेटेे की बार-बार की मिन्नतों पर आखिरकार ब्रांच मैनेजर ने सहयोगी अवधेश मिश्रा को विड्राल देकर अंगूठा लगवाने को बाहर भेजा, लेकिन अंगूठा लगवाने की कोशिश के दौरान ही रामलाल ने दम तोड़ दिया। बीमार किसान की बैंक के बाहर तांगे पर मौत होने से ब्रांच में मौजूद कई ग्राहक आगबबूला हो गए और हंगामा करने लगे। हालात बेकाबू होने से पहले ही शीशगढ़ पुलिस पहुंच गई और ग्राहकों को समझा-बुझाकर शांत किया। शाखा प्रबंधक अनुज गुप्ता ने बैंक स्टाफ के अभद्रता करने या लापरवाही बरतने के आरोपों को खारिज कर दिया। कहा कि भारी भीड़ के बावजूद जानकारी मिलते ही सहयोगी को विड्राल देकर अंगूठा लगवाने भेजा था, लेकिन तब तक गंभीर बीमार रामलाल की मौत हो गई।
रामलाल अपने पीछे 4 बेटों, दो बेटियों की कच्ची गृहस्थी छोड़ गए हैं। सबसे बड़े बेटे मनोज और दूसरे नंबर की बेटी सुनीता की ही शादी हो पाई है। सिर्फ 4.5 बीघा जमीन है। खेतीबाड़ी के अलावा मजदूरी कर बच्चों का पेट पाल रहे थे।