बरेली। चश्माघरों की मुफ्त जांच के फेर में पड़कर लोग आंखों की अनमोल रोशनी से समझौता कर रहे हैं। विशेषज्ञ के मुताबिक चश्मों की दुकान में चश्मे का नंबर तो दुकानदार जांच सकते हैं, पर आंखों की जांच प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट कर सकते हैं। ताकि गलत नंबर की आशंका ही न रहे।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से ऑप्टोमेट्रिस्ट सेवा के लिए जारी न्यूनतम मानक क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट 2010 में अधिसूचित हैं। ऑप्टोमेट्रिस्ट आंख के शुरुआती विकार मोतियाबिंद, ग्लूकोमा पहचान कर मरीज को नेत्र विशेषज्ञ के पास रेफर करेंगे।
ऑप्टोमेट्रिस्ट का नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन्स एक्ट 2021 के तहत राज्य या राष्ट्रीय एलाइड हेल्थ काउंसिल में पंजीकृत होना अनिवार्य है। ताकि आंखों की जांच में कोई भी चूक न हो सके। ऑप्टोमेट्रिस्ट ही दृष्टि की जांच, चश्मे का नंबर निर्धारण, कॉन्टैक्ट लेंस फिटिंग के लिए अधिकृत हैं।
बिना वैध योग्यता वाले व्यक्ति जैसे अप्रशिक्षित चश्मा विक्रेता द्वारा क्लिनिकल आई टेस्टिंग या परामर्श देना अब गैरकानूनी माना है। यह कदम झोलाछापों पर रोक लगाने और मरीजों को सुरक्षित सेवाएं मुहैया कराने के लिए लिया गया है। चश्माघरों के लिए नियम ताक पर हैं।
लेंस के नंबर के बावजूद विशेषज्ञ परामर्श जरूरी
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. कपिल अग्रवाल के मुताबिक ऑप्टोमेट्रिस्ट आंखों की जांच के बाद दूर या निकट दृष्टि दोष की संभावना जता सकते हैं। पर चश्मा लगेगा या नहीं, सिर्फ दवा और जीवनशैली में बदलाव से इसे सुधारा जा सकता है इसका निर्णय विशेषज्ञ ही करते हैं। एक बार की जांच के बाद चश्मा लगाना सही नहीं कहा जा सकता। बिना जरूरत न्यूनतम पावर 0.25 या 0.5 डायोप्टर का चश्मा लगातार लगाने से आंखों में थकान, भारीपन, हल्का सिरदर्द, असहजता, फोकस में असुविधा की आशंका रहती है।