पहले समाचार पत्र ब्लैक एंड व्हाइट होते थे। बाद में रंगीन निकलने लगे। नई भाषा, नए तेवर और मनोरंजन पेज भी शामिल होते गए। इसी तरह आगे भी बदलाव आते रहेंगे। पत्रकारों में वैचारिक मतभेद और मनभेद की बात करें तो मतभेद हमेशा रहे, अब मनभेद ने भी जगह बना ली है।
सवाल : पत्रकारिता के बीच सोशल मीडिया की भूमिका को कैसे देखते हैं?
जवाब : सोशल मीडिया के बीच पत्रकारिता करना एक चुनौती है। यहां जरा सी भी चूक आपको पत्रकार से पक्षकार बना सकती है। आपको पूरे तर्क, तथ्य और संदर्भ के साथ खबरें रखनी होंगी, नहीं तो आपने कुछ भी परोस दिया और असल चीज सोशल मीडिया पर आ गई तो बतौर पत्रकार आपकी और आपके संस्थान की भद्द पिटने में देर नहीं लगेगी।
सोशल मीडिया के नुकसान भी हैं। इसे अगर जंगल में आया नया जानवर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यहां झूठ का पुलिंदा भी खूब मिलता है। जो देश में पहले कभी नहीं होता था, अब वह सोशल मीडिया पर दिखाई दे जाता है। सोशल मीडिया ही कई बार मुख्य मीडिया की भूमिका अदा कर देता है। इसके बाद नुकसान होते हैं। रिश्ते तक बंट जाते हैं।
सवाल: पत्रकारिता की नई पीढ़ी के लिए क्या कहेंगे?
जवाब: एक ही बात हमेशा कहता हूं। जितना अधिक से अधिक अपनी भाषा में अच्छा व उत्कृष्ट पढ़ सकते हैं, पढ़िए, पढ़िए...पढ़िए... और पढ़िए। अच्छी भाषा के लिए, विचारों के लिए, विचार क्षमता के लिए, मानसिक-बौद्धिक क्षितिज के विस्तार के लिए। पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है। आप कहेंगे कि समय नहीं है पढ़ने के लिए तो भी कहूंगा कि समय निकालिए और रोजाना पढ़िए। किसी एक विचारधारा से न बंधे। सभी विचारधाराओं को पढ़ें। जो विचारधारा अच्छी होगी आपका मन, आपकी आत्मा उसे अपना लेगी।