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साक्षात्कार: वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव का पत्रकारिता की नई पीढ़ी को संदेश, कहा- पढ़िए और पढ़ते रहिए

Sat, 02 Sep 2023 11:44 AM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

सार

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि अच्छी भाषा के लिए, विचारों के लिए, विचार क्षमता के लिए, मानसिक-बौद्धिक क्षितिज के विस्तार के लिए। पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए पढ़ने की आदत जरूर डालिए। खूब पढ़िए और पढ़ते रहिए। 
 
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वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पिछले एक-दो दशक की पत्रकारिता में क्या हुआ, कैसे हुआ? इससे आगे बढ़कर नई पीढ़ी के पत्रकारों को यह समझना होगा कि नवीन विचारों के लिए, क्षमताओं को प्रबल करने के लिए, मानसिक, बौद्धिक क्षितिज के विस्तार के लिए सिर्फ एक ही विकल्प है। पढ़िए...पढ़िए और पढ़िए। इसका कोई विकल्प नहीं है। यह कहना है कि वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव का। शुक्रवार को वह बरेली के एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। अमर उजाला संवाददाता से उन्होंने पत्रकारिता पर खास बातचीत की। उसके प्रमुख अंश यह हैं।

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सवाल: आप पत्रकारिता से कब से जुड़े, कैसे शुरुआत हुई?
जवाब: अंग्रेजी से एमए कर रहा था। उसी समय पायनियर से जुड़ गया। इमरजेंसी के दौरान से ही कई क्रांतिकारी नेताओं का घर आना-जाना रहता था। उसमें संघ की पृष्ठभूमि के लोग भी थे। ऐसे में घर पर साहित्य भी बहुत होता था तो पढ़ने की रुचि बचपन से ही थी। मेरी पढ़ने में रुचि देखकर घर में सभी को लगा कि मैं पत्रकार बन सकता हूं।

सवाल : पिछले दो दशक और आज की पत्रकारिता में क्या बदलाव महसूस किए?
जवाब : तकनीक के साथ परिवर्तन आते गए। अखबारों का स्वरूप बदला। टीवी पर खबरों को चलाने के तरीके बदले। यह सभी बदलाव निर्भर करते हैं पाठक के मनोविज्ञान पर। समय के साथ आमजन की जीवनशैली बदल रही थी। उनकी रुचियों में तब्दीली आ रही थी। मीडिया मनोविज्ञान के पीछे चलता है। लोगों को प्रतिबिंबित करता है। इसलिए बदलते समाज के साथ बदलाव स्वभाविक है। 

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पहले समाचार पत्र ब्लैक एंड व्हाइट होते थे। बाद में रंगीन निकलने लगे। नई भाषा, नए तेवर और मनोरंजन पेज भी शामिल होते गए। इसी तरह आगे भी बदलाव आते रहेंगे। पत्रकारों में वैचारिक मतभेद और मनभेद की बात करें तो मतभेद हमेशा रहे, अब मनभेद ने भी जगह बना ली है।

सवाल : पत्रकारिता के बीच सोशल मीडिया की भूमिका को कैसे देखते हैं?
जवाब : सोशल मीडिया के बीच पत्रकारिता करना एक चुनौती है। यहां जरा सी भी चूक आपको पत्रकार से पक्षकार बना सकती है। आपको पूरे तर्क, तथ्य और संदर्भ के साथ खबरें रखनी होंगी, नहीं तो आपने कुछ भी परोस दिया और असल चीज सोशल मीडिया पर आ गई तो बतौर पत्रकार आपकी और आपके संस्थान की भद्द पिटने में देर नहीं लगेगी। 

सोशल मीडिया के नुकसान भी हैं। इसे अगर जंगल में आया नया जानवर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यहां झूठ का पुलिंदा भी खूब मिलता है। जो देश में पहले कभी नहीं होता था, अब वह सोशल मीडिया पर दिखाई दे जाता है। सोशल मीडिया ही कई बार मुख्य मीडिया की भूमिका अदा कर देता है। इसके बाद नुकसान होते हैं। रिश्ते तक बंट जाते हैं।

सवाल : अब कैसा समय है पत्रकारिता का?
जवाब: सिर्फ भाषा की बात करूं तो यह मिश्रित समय है। कुछ गिने-चुने हिंदी समाचार पत्रों को छोड़ दें तो लगभग सभी ने हिंदी का गला घोटा है। हिंदी को हिंग्लिश कर दिया है। खबर के इंट्रो में ही दो-चार शब्द हिंग्लिश के आ ही जाते हैं। इस पर बहुत सुधार करने की जरूरत है। 

मैं इसका कारण यह भी मानता हूं कि सभी को अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए इंग्लिश मीडियम स्कूलों में भेजना है तो हिंदी भाषा की अपेक्षा ही क्या करें। मैं बेशक मानता हूं कि असीमित ज्ञान पाने के लिए अंग्रेजी साहित्य की ओर जाना होगा मगर यह भी कहता हूं कि हिंदी पर पकड़ बनाए रखिए और हिंदी में लिखिए। उसके साथ छेड़छाड़ मत करिए।
 
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सवाल: पत्रकारिता की नई पीढ़ी के लिए क्या कहेंगे?
जवाब: एक ही बात हमेशा कहता हूं। जितना अधिक से अधिक अपनी भाषा में अच्छा व उत्कृष्ट पढ़ सकते हैं, पढ़िए, पढ़िए...पढ़िए... और पढ़िए। अच्छी भाषा के लिए, विचारों के लिए, विचार क्षमता के लिए, मानसिक-बौद्धिक क्षितिज के विस्तार के लिए। पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है। आप कहेंगे कि समय नहीं है पढ़ने के लिए तो भी कहूंगा कि समय निकालिए और रोजाना पढ़िए। किसी एक विचारधारा से न बंधे। सभी विचारधाराओं को पढ़ें। जो विचारधारा अच्छी होगी आपका मन, आपकी आत्मा उसे अपना लेगी।
 
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