पटाखों से ध्वनि और वायु प्रदूषण होने पर भी रोक न लगने से पर्यावरणविद हैरान
बरेली। प्रदूषण किसी भी स्तर का हो उसका स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ना तय है। मगर, आंकड़े पराली जलाने से आतिशबाजी को ज्यादा घातक बता रहे हैं। लिहाजा पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनके मुताबिक, पराली जलाने से सिर्फ वायु प्रदूषण ही होता है जबकि जबकि पटाखों से वायु के साथ ध्वनि प्रदूषण भी होता है। इतना ही नहीं हर साल कई ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, जिनमें जान और माल का बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। सरकार ने पराली जलाने पर तो किसानों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दे दिए हैं, लेकिन पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की कोई पहल नहीं की है। सरकार की इस चुप्पी से किसान, चिकित्सक और बुद्धिजीवी हैरान हैं। उन्होंने सरकार से पटाखों पर तत्काल प्रतिबंध की मांग की है।
विशेषज्ञों के मुताबिक पटाखे मांगलिक कार्यों और त्योहारों आदि पर साल भर चलाए जाते हैं, जबकि धान की पराली साल में एक बार ही जलती है। इस आधार पर गणना करें तो पटाखों से साल भर में हुए घातक प्रदूषण से पराली का धुआं कई गुना कम होता है। यूं तो वाहन, कूड़ा जलने, सॉलिड वेस्ट, मेडिकल वेस्ट आदि के प्रदूषण की रोकथाम के लिए भी एनजीटी समय-समय पर सरकारों को निर्देशित करती है, जिस पर अब तक कोई ठोस रणनीति नहीं बन सकी है। मगर, चार साल पहले जैसे ही एनजीटी ने पराली को प्रदूषण का कारक माना, सरकार सक्रिय हुई, प्रशासन, पुलिस ने किसानों पर ताबड़तोड़ कार्रवाइयां कर दीं। चिकित्सकों के मुताबिक पटाखों से होने वाला धुआं पराली से कई गुना खतरनाक होता है, इसलिए इस प्रदूषण का रोकना कहीं ज्यादा जरूरी है, क्योंकि पटाखों का जहरीला धुआं भी हवा में घुलकर आंखों में जलन, सांस, त्वचा संबंधी बीमारियों की वजह बनता है।
पटाखों से तीन सौ एक्यूआई तक होता है प्रदूषण
बरेली कॉलेज बॉटनी विभाग के एमिरेट प्रो. डॉ. डीके सक्सेना के मुताबिक पराली से धुआं होता है। इससे वायु प्रदूषण होता है लेकिन पटाखों से सर्वाधिक प्रदूषण होता है। बीते चार साल के आंकड़ों के मुताबिक माह भर तक पराली जलने से प्रदूषण का स्तर 50 से 100 एक्यूआई तक बढ़ा। वर्ष 2016 में पटाखे चलने से एक्यूआई 550, 2017 में 595, 2018 में 602, 2019 में रिकॉर्ड 610 दर्ज हुआ था, जबकि पराली जलने पर यह आंकड़ा तीन सौ से चार सौ के बीच ही दर्ज किया गया था। उन्होंने पटाखे न चलाने की अपील की है।
दम घोट सकती हैं पटाखों से उत्सर्जित गैसें
वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक पटाखे चलने से उत्सर्जित गैसें पर्यावरण समेत शरीर को भी नुकसान पहुंचाती है। कार्बन मोनोऑक्साइड जहरीली, गंधहीन गैसें भी पटाखों से निकलती हैं, जो हृदय की मांस पेशियों, आंख को नुकसान पहुंचाती है। सल्फर डाइऑक्साइड ब्रोंकाइटिस जैसी सांस की बीमारी पैदा करती हैं। इससे बलगम, गले की बीमारियां होती हैं। नाइट्रेट से कैंसर जैसी बीमारियां, हाइड्रोजन सल्फाइड से मस्तिष्क और दिल को नुकसान, बेरियम ऑक्साइड से आंखों और त्वचा को नुकसान पहुंचता है। क्रोमियम गैस सांस की नली, त्वचा समेत जीव जंतुओं के लिए नुकसानदेह होती है।
हादसों की वजह भी बनते हैं पटाखे
प्रकृति से लगाव रखने वाले प्रगतिशील किसान अनिल साहनी के मुताबिक विडंबना है कि सरकार किसानों पर कार्रवाई कर रही है जबकि पटाखों का प्रदूषण रोकने के लिए कहीं कोई प्रयास नहीं कर रही। उल्लास के नाम पर दीपावली पर पटाखों का खूब शोर होता है, खूब धुआं उठता है। कई जगहों पर आगजनी भी होती है, इनमें कई बच्चे भी झुलस जाते हैं, लेकिन इस समस्या को कोई समझना नहीं चाहता। यदि प्रशासन प्रदूषण की समस्या को समझता तो पटाखों की बिक्री पर उतनी ही सख्ती होती, जितनी किसानों पर पराली जलाने को लेकर हो रही है।
मुनाफे में मिठाई से ज्यादा महंगा प्रदूषण
संक्रामक रोग चैप्टर के अध्यक्ष रहे डॉ. अतुल अग्रवाल के मुताबिक दीपावली को मिठाइयों का पर्व माना जाता है। मगर हैरत यह कि दीपावली पर मिठाई से ज्यादा सेल पटाखों की होती है। यानी मिठाई से कहीं ज्यादा पटाखों पर खर्च हो रहा है। प्रत्येक घर में औसतन सौ रुपये की मिठाई आती है जबकि पांच सौ रुपये तक के पटाखे चलते हैं। कुछ घरों में हजारों रुपये के पटाखे चलते हैं। हर साल सौ करोड़ रुपये पटाखे के रूप में जला दिए जाते हैं। वहीं, मिठाई में मिलावट के बाद भी 30 से 40 फीसदी, पटाखों में 70 फीसदी तक मुुनाफा होता है। यानी जितना प्रदूषण उतना मुनाफा।