बदायूं। बाजार में एनसीईआरटी पर आधारित पाठ्यक्रम की सभी कक्षाओं की किताबों की भरमार है, लेकिन इनमें एनसीईआरटी की उत्तर प्रदेश राज्य के लिए अनुमन्य किताबों की संख्या बहुत कम है। हालात ये हैं कि एनसीईआरटी पर आधारित पाठ्यक्रम की किताबों को निजी प्रकाशकों ने बाजार में उतार दिया है। इनका मूल्य चार गुना से भी ज्यादा है। हालांकि पाठ्यक्रम लगभग एक जैसा ही है।
शासन के थोड़े हस्तक्षेप के बाद स्कूलों में एनसीईआरटी की पुस्तकें चलने लगी हैं, लेकिन इससे स्कूल संचालकों, दुकानदारों और निजी प्रकाशकों को कोई फायदा नहीं हो रहा था। लिहाजा निजी प्रकाशकों ने एनसीईआरटी पर आधारित पाठ्यक्रम की अपनी किताबें बाजार में उतार दीं। हालांकि इनके और उत्तर प्रदेश शासन के प्रकाशन वाली किताबों में पाठ्यक्रम एक जैसा ही है, बस कुछ अतिरिक्त चीजें दी गई हैं, लेकिन निजी प्रकाशकों ने रेट चार गुना से भी ज्यादा रखे हैं।
एनसीईआरटी की 245 पन्नों की एक किताब 75 रुपये की है, जबकि एनसीईआरटी पाठ्यक्रम आधारित निजी प्रकाशक की 237 पन्नों की किताब 325 रुपये में मिल रही है। अभिभावक भी बच्चों के भविष्य को लेकर ज्यादा विरोध नहीं कर पा रहे हैं। बच्चों के लिए चुनिंदा प्रकाशकों की किताबें लेना अब अभिभावकों की मजबूरी बन गई है।
कई किताबों में तो प्रिंट रेट से ऊपर अलग से स्लिप चस्पा
शहर में कई किताबों के डिपो है। जहां कक्षा एक से लेकर 12 तक की किताबें मिलती हैं। इनमें से कुछ चुंनिदा बुक डिपो तो कई किताबों पर अलग से प्रिंट स्लिप चिपकाकर प्रकाशित मूल्य से ज्यादा दाम वसूल रहे हैं। दरअसल, कुछ स्कूलों की किताबें चुनिंदा दुकानों पर ही मिल रही हैं। ऐसे में अभिभावक चाहकर भी विरोध नहीं कर पा रहे हैं।
एनसीईआरटी की किताबों पर नहीं है ज्यादा कमिशन
सरकार की ओर से जारी एनसीईआरटी की किताबों पर पुस्तक विक्रेताओं को बहुत कम कमीशन मिलता है, जबकि निजी प्रकाशक से 30 से 40 फीसदी तक कमीशन देते हैं। इसके अलावा स्टेशनरी के ऑफर अलग से मिलते हैं। इस मोटे कमीशन के लालच में स्कूल संचालक प्रकाशकों से सीधा डील कर लेते हैं और एक निश्चत दुकानों पर उनको रखवा देते हैं। वहीं से बच्चों को खरीदने के निर्देश दिए जाते हैं।
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हम लोग अगर अपनी पसंद के निजी प्रकाशक से किताबें अलग ले लेते हैं, तो उनको बेचना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि शिक्षकों द्वारा अपनी पसंद के प्रकाशकों की किताबें बच्चों से मंगाई जाती है। जो काफी महंगी होती है। बच्चों की मांग की वजह से वही देनी पड़ती हैं। कई बार वे किताबें कुछ चुनिंदा जगहों पर ही मिलती है। - आशीष कुमार, दुकानदार
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सरकार की ओर से जारी एनसीईआरटी की किताबों में ज्यादा बचत नहीं होती है। वे मांग के अनुरूप ही मंगाई जाती है, क्योंकि अगर शिक्षक उन किताबों से नहीं पढ़ाएंगे तो बच्चे कैसे पढ़ेंगे। हालांकि निजी प्रकाशक एनसीईआरटी की पुस्तकें और सरकारी एनसीईआरटी की पुस्तकों के पाठ्यक्रम में कोई अंतर नहीं है। बस कुछ चित्र आदि बढ़ा दिए हैं। -रोहित, दुकानदार