दो बजे शुरू हो सका बसों का संचालन
वजह कि यहां पर चालक, परिचालक उनकी मृतक की पत्नी को नौकरी, एक करोड़ मुआवजे की मांग पर अड़े थे। बेटे की मौत से परिवार का चिराग बुझ गया। पिता का रो-रोकर बुरा हाल हो गया था। वह बार-बार कह रहे थे कि मेरा इकलौता बेटा था, वह भी अब नहीं रहा। दोपहर 12:30 बजे जब पुन: एआरएम एके वाजपेयी आए, वह अपने साथ मृतक के पिता शिशुपाल व चालकों, परिचालकों को अपने साथ सेटेलाइट बस स्टेशन पर लेकर गए। वहां बातचीत के बाद मामला खत्म किया। जिसके बाद दो बजे से बसों का संचालन शुरू हो सका।
आठ घंटे की ड्यूटी के बाद नहीं दिया गया आराम
साथी चालक सतीश यादव ने बताया कि लंबी दूरी के बसों पर दो चालक लगाए जाते हैं, जब एक थक जाता है तो दूसरा चलाता है। जबकि यहां पर चालक से लगातार ड्यूटी कराई गई। पहले उसको दिल्ली भेजा गया, वहां से लौटने पर उत्तराखंड टनकपुर भेजा गया। फिर वहां से आने के बाद लखनऊ भेज गया। लगातार 1300 किमी दूरी तय करने के कारण नींद न पूरी होने के कारण यह हादसा हुआ है। इसके लिए उच्चाधिकारी जिम्मेदार हैं, जो हमेशा नौकरी से बाहर निकालने का दबाव बनाते रहते हैं।
पिता को मौके पर दी 70 हजार की आर्थिक सहायता
बातचीत के दौरान पिता शिशुपाल को परिवहन निगम की तरफ से अंतिम संस्कार के लिए 20 हजार रुपये, यात्री सुविधा के तहत हादसे में मृतकों को दिए जाने वाले 7.50 लाख रुपये में से 50 हजार रुपये की मदद की। बाकी शेष धनराशि वारिसान का प्रमाणपत्र लाने पर आश्रितों को दी जाएगी। मृतक के पीछे उसकी पत्नी रेखा (28) व छह माह का बच्चा लल्ला है।
रुहेलखंड डिपो के एआरएम एके वाजपेयी ने बताया कि बसों का संचालन न होने के पीछे दो-चार अराजक कर्मचारियों का हाथ था। उन्होंने अपनी बसों को सड़क पर आगे लगाकर खड़का कर दिया, जिससे पीछे के वाहन नहीं निकल सके। मृतक के पिता को 70 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी गई है। आगे वारिसान का प्रमाणपत्र मिलने पर धनराशि दी जाएगी।