अलीगंज। मौसम में बदलाव से आलू की फसल में कई तरह के रोग लग जाते हैं। समय रहते इनका प्रबंधन नहीं करने पर फसल नष्ट हो जाती है। दुकानदारों ने किसानों को आलू की फसल को झुलसा रोग से बचाने के लिए दवाओं के छिड़काव करने की सलाह दी है।
मौसम की अनुकूलता के आधार पर आलू की फसल में पिछेती झुलसा बीमारी आने की आशंका है। आसमान में बादल होने पर आलू की फसल में फंगस के इंफेक्शन की आशंका बढ़ जाती है। यह झुलसा रोग का प्रमुख कारण होता है। बादल होने पर तुरंत दवाओं का छिड़काव करना चाहिए। झुलसा रोग दो तरह के होते हैं, अगेती झुलसा और पिछेती झुलसा। अगेती झुलसा दिसंबर की शुरुआत में लगता है और पिछेती झुलसा दिसंबर के अंत से जनवरी में लग सकता है।
इस समय आलू की फसल को पिछेती झुलसा रोग का खतरा है। अगेती झुलसा में पत्तियों की सतह पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, जिनमें बाद में चक्रदार रेखाएं दिखाई देती हैं। रोग के प्रभाव से आलू छोटे व कम बनते हैं। पिछेती झुलसा आलू के लिए ज्यादा नुकसानदायक होता है। वातावरण में बदलाव से होने वाले रोग के कारण चार से छह दिन में ही फसल नष्ट हो जाती है। बीमारी में पत्तों के ऊपर काले काले चकत्ते दिखाई देते हैं, जो बाद में बढ़ जाते हैं। संवाद
इन दवाओं का करें छिड़काव
कृषि विभाग से सेवानिवृत्त एडीओ भगवान सिंह के अनुसार, इस समय आलू में पिछेती झुलसा का खतरा है। रोग का लक्षण दिखाई देते ही किसान मैंकोजेब (इंडोफिल एम-45) या मैंकोजेब दवा की 600-800 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें। मौसम जब ठंडा व नम हो तो यह छिड़काव सात दिन के बाद भी किया जा सकता है। ऐसा करने से आलू की फसल को पिछेती झुलसा रोग से बचाया जा सकता है। संवाद