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ट्रेजडी किंग की क्रांति, मुगले आजम, सौदागर बरेली के टॉकीजों में 26 हफ्ते चली

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दिलीप कुमार (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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एक प्रशंसक ने काम छोड़कर लगातार 38 दिनों तक देखी मुगले आजम
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बरेली। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार के प्रति उनके फैं स में ऐसी दीवानगी थी कि उनकी कोई फिल्म नहीं छोड़ते थे। बरेली शहर में ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने उनकी फिल्म मुगले आजम 38 दिनों तक लगातार देखी। शहर में क्रांति, मुगले आजम और सौदागर ने सिल्वर जुबली मनाई थी। दिलीप कुमार एक बार यहां आ भी आ चुके हैं। वह कांग्रेस सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे धर्मदत्त वैद्य के यहां आए थे। उनके साथ भोजन भी किया था।

38 दिनों तक लगातार देखी मुगले आजम

मोहम्मद यासीन उर्फ मुन्ना पेशे से स्कूटर मैकेनिक हैं। बताते हैं कि पुराने अभिनेताओं में वह सिर्फ दिलीप कुमार की फिल्में ही देखा करते थे। जगत टॉकीज में मुगले आजम 26 हफ्तों तक लगी रही। इस फिल्म ने सिल्वर जुबली पूरी की। मुगले आजम देखने के लिए मोहम्मद यासीन ने काम बंद रखा और लगातार 38 दिनों तक टॉकीज में फिल्म देखने जाते रहे। उन्होंने इस फिल्म के करीब 80 शो देखे थे।

दिलीप कुमार को पहनाया था कोट

आजमनगर के असलम करीब तीन दशक पहले मुंबई में रोजगार के लिए गए। वहां उन्हें गौरी प्रोड्यूसर में ड्राइवर की नौकरी मिल गई। वह नूर मोहम्मद की गाड़ी चलाते थे। सन 1995 की बात है कि गौरी प्रोड्यूसर की फिल्म बन रही थी। उसमें दिलीप कुमार अभिनेता थे। प्रोड्यूसर के कहने पर वह एक दिन दिलीप कुमार को उनके बंगले पर लेने गए थे। जब वह गाड़ी में बैठने आए तो उनके साथ आए एक व्यक्ति के हाथ में उनका कोट था। वह कोट गाड़ी में रख लिया और शूटिंग पर उतरते समय कोट लेकर उतरे तो असलम ने गेट खोला और उन्हें वह कोट पहनाया था। 1998 में असलम की पत्नी तबीयत अधिक खराब होने पर वह उन्हें बरेली लेकर आ गए कुछ दिन बाद पत्नी का इंतकाल होने के बाद वह मुंबई नहीं जा सके।

आठ महीने कमल टॉकीज में लगी रही क्रांति

जाटवपुरा के सुमेश सिर्फ सिनेमाघर तक तभी जाते थे जब दिलीप कुमार की फिल्में लगती थीं। बताया कि उनकी क्रांति, नया दौर, विधाता और शक्ति कई बार देखी। इसमें क्रांति शहर की कमल टॉकीज में लगी थी और उन्होंने इसके कई शो देखे। उन्हें आज भी दिलीप कुमार की फिल्मों कई गाने मुंह जुबानी याद है। यहां तक की वह गाने को सुनकर उस फिल्म का नाम और वह किस सन में बनी थी, यह आज भी बता देते हैं।

दिलीप कुमार से सीखी अदाकारी

शहर के शाहबाद निवासी आरिफ हुसैन रंगकर्मी है। वह दिलीप कुमार की फिल्में देखकर ही बड़े हुए। उनके मन में जगा कि वह भी अभिनेता बनेंगे और उन्हाेंने रंगमंच पर काम करना शुरू कर दिया। मुंबई गए लेकिन बात नहीं बनी। इस दौरान उन्होंने दो भोजपुरी फिल्माें में काम किया। पुलिस के किरदार निभाए। अभी भी रंगमंच से जुड़े हैं।

शहर में जब छा गए थे सौदागर के डॉयलाग

मारवाड़ी गंज के बारदाना व्यापारी विनोद कुमार जैन बताते हैं कि दिलीप कुमार और राजकुमार की जब सौदागर रिलीज हुई तो 27 हफ्तों तक टॉकीज में लगी रही। टिकट के लिए लाइन लगती थी। वह ऐसा समय था जब सौदागर फिल्म के डायलाग लोगों को रट गए थे। बच्चे-बच्चे की जुबान पर दोनों अभिनेताओं के डायलॉग थे।

किशोर वय से देख रहे दिलीप कुमार की फिल्में

चौपुला निवासी राकेश बताते हैं कि 15-16 साल की उम्र से ही वह दिलीप कुमार की फिल्में देखने लगे थे। कर्मा का वह डायलाग आज तक नहीं भूले हैं जब दिलीप कुमार कहते हैं कि शेर को अपने बच्चों की हिफाजत के लिए शिकारी कुत्तों की जरूरत नहीं है। क्रांति का डायलॉग आज भी याद है कि जब जिंदगी दौड़ती है तो रगों में बहता खून भी अपने आप दौड़ता है।

उनके अभिनय से बहुत कुछ सीखा

रंगकर्मी, एलआईसी के कैशियर राकेश श्रीवास्तव कहते हैं कि दिलीप कुमार साहब को देखकर बहुत कुछ सीखा है। रंगमंच के दौरान उन्हें देखकर अभिनय सीखा करते थे। थिएटर में काम करने की प्रेरणा ही उन्हीं से मिली। गजब की अदाकारी थी उनकी। उनका जाना बेहद दुखद है।

बरेली से लोगों के जेेहन में आज भी ताजा हैं दिलीप कुमार की यादें

बरेली। बरेली के लोगों के जेहन में दिलीप कुमार की यादें आज भी ताजा हैं। उनका जब बरेली आना हुआ तब उन्हें देखने के लिए पूरा हुजूम उमड़ पड़ा था।
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नाइटेंगल संगीत अकादमी के निर्देशक राज मलिक ने बताया कि उनकी दिलीप कुमार से 1970 में बरेली आने पर मुलाकात हुई। कांग्रेस नेता शायर महेंद्र सिंह बेदी उन्हें अपने साथ बरेली लेकर आए थे। यहां वह कुछ देर जसवंत प्रसाद बब्बू के घर कुछ रुके थे। दूसरी मुलाकात मुंबई में फि ल्म शूटिंग के दौरान हुई थी।
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