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हरे रंग का लिबास पहन पेश करते हैं अकीदत का नजराना

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बरेली। ‘निकल के रोता है दिन, छुप के रात रोती है.. हुसैन गम में तेरे, कायनात रोती है।’ हजरत इमाम हुसैन की शहादत का गम पूरी दुनिया के मुसलमान मनाते हैं। इसी गम और अदबो मोहब्बत की एक झलक खानकाह नियाजिया की अजादारी में देखने को मिलती है। यहां हर मजहबो मिल्लत के लोगों की भागीदारी इंसानियत और इत्तेहाद की मिसाल है। दूसरे मुल्कों से भी लोग यहां मन्नतो मुराद लेकर आते हैं।
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खानकाह के साथ ही तीन सदी पहले यहां इमामबाड़ा कायम हो गया था और तभी से अजादारी का सिलसिला भी शुरू हो गया। भले ही दूसरी जगहों पर रिवायतें बदल गईं हों या खत्म भी हो गई हैं, मगर खानकाह में आज भी रिवायतें उसी अंदाज में कायम हैं। मसलन यहां की खास पहचान मोहर्रम के दौरान फकीरी लिबास धारण करना है। हरे रंग की लिबास न सिर्फ खानवादे बल्कि मुरीद और मानने वाले भी पहनते हैं। यह लिबास लोग यौमे आशुरा (दस मोहर्रम) तक धारण रखते हैं, जो ताजिए दफ्न होने के बाद बदला जाता है।
यूं तो चांद रात से ही खानकाह में अजादारी का सिलसिला शुरू हो जाता है। अलम सजा दिए जाते हैं। इमाम हुसैन के नाम पर लंगर का सिलसिला भी शुरू हो जाता है और सोयम तक कायम रहता है। खास कर चार मोहर्रम से इमामबाड़े में जरी, ताजिया, निशान, अलम शरीफ जियारत के लिए रखे जाते हैं। फिर मन्नतों मुराद का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसी दिन से अजादार फकीरी लिबास धारण कर लेते हैं और नंगे पैर रहते हैं। इसमें दूसरे मजहब के लोग भी होते हैं जो गमे अय्याम में शिरकत करते हैं।
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इसलिए पहनते हैं हरा लिबास
लिबास के संबंध में खानकाह के प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी का बताना है कि हरे लिबास का पहनना शहीदाने कर्बला को अकीदत का नजराना पेश करना है और उनकी मोहब्बत का इजहार है। इमाम हुसैन ने हक की जंग लड़कर कर्बला से जो इंसानियत और सच का पैगाम दिया है.. उसे आम करना है। जिन्होंने हक के लिए घर का बच्चा बच्चा कुर्बान कर दिया।
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