बरेली। आम आदमी के लिए सरकार की ओर से भेजी गई राहत की पोटली विभागों के खातों में पड़ी है। दूसरी ओर लाभार्थी टकटकी लगाए बैठे हैं। समाज कल्याण और महिला कल्याण विभागों के खातों में करोड़ों रुपये पड़े हैं।
सहायता अनुदान और सब्सिडी की धनराशि भी लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाई है। राजकीय पॉलिटेक्निक (जीटीआई) के हेड में भी निर्माण के मद में 3.53 करोड़ रुपये पड़े हैं। मशीनों तक की खरीदारी नहीं की गई है।
शादी अनुदान, पेंशन आदि विभिन्न तरह की आर्थिक सहायता देने में समाज कल्याण विभाग और महिला कल्याण विभाग काफी पीछे हैं। लाभार्थी आए दिन वह इन विभागों के कार्यालयों में भटकते दिखाई देते हैं। अब वित्त वर्ष खत्म होने में एक माह बाकी है।
ऐसे में जाहिर है कि जिन विभागों ने अब तक बजट खर्च नहीं किया है, अचानक उसे खपाने की होड़ मचेगी। इस आपा-धापी में किए गए खर्चे कितने उचित होंगे? इस पर भी सवाल खड़े होंगे।
बताया जा रहा है कि महिला कल्याण विभाग के खाते में सहायता अनुदान के 3.42 करोड़ रुपये डंप हैं। उपायुक्त स्वत: रोजगार भी राष्ट्रीय आजीविका मिशन (एनआरएलएम) में सब्सिडी के 18.50 लाख रुपये दबाए बैठे हैं। बताया जा रहा है कि यह रकम विभिन्न स्वयं सहायता समूहों और स्वरोजगारी महिलाओं को देने के लिए है। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में भी सहायता अनुदान के 2.81 करोड़ रुपये कोषागार में ही डंप हैं।
पीडब्ल्यूडी बदायूं-पीलीभीत वृत्त को निर्माण के लिए 49.55 लाख रुपये मिले थे। इसमें से अब तक एक रुपये खर्च नहीं हुए है। कृषि विभाग में बीज की खरीद आदि के लिए मिले 10.75 लाख रुपये खाते में ही पड़े हैं।
दैवीय आपदा के पीड़ितों को सहायता देने के लिए कलक्ट्रेट के राहत अनुभाग के पास 1.64 करोड़ रुपये खाते में पड़े हैं। क्रॉप कटिंग आदि के मद में भी 1.99 लाख रुपये बचे पड़े हैं।