1965 और 1971 में पाकिस्तान से जंग लड़ चुके पूर्व सैनिक भले ही अब उम्र के अंतिम पड़ाव में हैं लेकिन भारतीय सेना से ट्रेनिंग में मिला अंतिम सांस तक दुश्मनों से लड़ने का जज्बा उनके अभी भी बरकरार है। जंग ने उनके शरीर को कई जख्म दिए, जिसकी वजह से उनको घर बैठना पड़ा लेकिन खून बहने से पहले सरहद पर हुई लड़ाई में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए और अभी भी उनमें काफी कसक बाकी है। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बनें हालात में कैंट में सेना की ओर से आवंटित आवासों में रह रहे पूर्व सैनिक बेहद बेचैन हैं। टीवी चैनल और अखबारों के जरिए वे पल-पल पर घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं। पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ बयान आता है तो उनकी भुजाएं फड़फड़ा उठती हैं। वह चाहते हैं कि एक बार उनको फिर से पाकिस्तान से लड़ने का मौका मिल जाए तो उनके जैसे सारे अरमान पूरे हो जाएंगे।
लाहौर तक घुसकर मारेंगे: हरिराम
19 कुमाऊं रेजीमेंट में नायक रहे 75 साल के हरिराम रोज अखबार पढ़ते हैं तो पत्नी देवकी देवी से कहते हैं कि काश एक बार और लड़ाई का मौका मिल जाता तो पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ा देते। उनकी पत्नी चुप हो जाती हैं। अमर उजाला की ओर से उनसे सवाल होता है कि क्या आप अपने पत्नी को फिर लड़ने भेज देंगी? तो हरिराम कहते हैं- यह नहीं भी भेजेंगी तो मैं कौन सा रुक जाऊंगा। अबकी लड़ने का मौका मिलेगा तो पाकिस्तान की फौज को लाहौर तक घुसकर मारूंगा। वह कहते हैं कि सरकार को एक बार हमें मौका देना चाहिए, क्योंकि हमारे पास लड़ाई का तजुर्बा है। हरिराम भारतीय सेना के उन योद्धाओं में से हैं, जिन्होंने 1971 और 1965 में भी पाकिस्तान से जंग लड़ी। उससे पहले 1962 में चीन से हुए युद्ध में भी वह शामिल रहे। इसमें वह सप्ताह भर तक चीन में युद्ध बंदी रहे, जिन्हें बाकी सैनिकों के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने छुड़वाया था। वह बताते हैं कि हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देने वाले चीन ने तब भारत से युद्ध का ऐलान कर दिया था। उस वक्त कुमाऊं रेजीमेंट में वह नए-नए थे लेकिन भरपूर जोश के साथ सिक्किम-चीन वार्डर पर अपनी पलटन में शामिल होकर युद्ध मैदान में दुश्मनों के छक्के छुड़ाए लेकिन बारूद खत्म हो जाने पर चीन ने पलटन को बंदी बना लिया था। 1971 में दुबारा हुए भारत-पाक युद्ध में हरिराम को फिर लड़ने का मौका मिला। बांग्लादेश-ढाका के पास भदुरिया में 10 दिसंबर को हुई मुठभेड़ में उन्होंने 15 दुश्मनों को मार गिराया लेकिन दुश्मनों की ओर से दागी गईं आठ गोलियां उनके शरीर में धंस गईं। इससे वह बुरी तरह जख्मी हो गए। उनका दायां हाथ और पैर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया। तीन साल तक चले इलाज के बाद वह ठीक तो हो गए लेकिन फिर दुश्मनों से लड़ने लायक नहीं रहे। उत्तराखंड के बागेश्वर निवासी हरिराम परिवार के साथ बरेली कैंट में सेना की ओर से आवंटित आवास में रह रहे हैं। दुश्मनों के मोर्चा लेने का जज्बा अभी भी उनके अंदर है।
लड़ने को मिले तो गिनकर लेंगे बदला: दामोदर
71 साल के हो चुके दामोदर सिंह आज भी युवाओं जितने जोशीले हैं। सर्जिकल अटैक के बाद टीवी से उनकी नजरें नहीं हटतीं। उन्होंने बताया कि जिस दिन उड़ी में आतंकी हमले से भारतीय जवानों के शहीद होने की खबर अखबार में पढ़ी, बहुत बुरा लगा, तब से गुस्सा था, जो सर्जिकल स्ट्राइक के बाद निकल गया। बोले- उस दिन इतनी खुशी हुई कि बता नहीं सकता। दामदोर सिंह 1971 में लड़ी पाकिस्तान के साथ लड़ाई अभी भी भूले नहीं हैं। कई पाकिस्तान सैनिकों को ढेर करने के दौरान बम फटने से उनकी आंख और कान के पास चोटें लगी थीं। लंबे इलाज के बाद वह ठीक हो पाए लेकिन जंग के मैदान की कसक आज भी उनके दिल में है। वह कहते हैं कि भारत सरकार को एक बार जरूर हमें लड़ाई का मौका देना चाहिए तो वह बदला ले लेंगे। बोले- हम तो अभी भी लड़ने को तैयार हैं, सरकार एक बार बुलाए तो सही। उनकी पत्नी कला देवी कहती हैं कि हम भी इनको नहीं रोकेंगे, अगर इनके दिल में लड़ने का अरमान है तो इनको सरहद पर जाने देंगे। अलीगढ़ के मूल निवासी दामोदर सिंह जाट रेजीमेंट में सिपाही थे। पूर्वी पाकिस्तान में कमलपुर ढलाई में वह अपनी पलटन के साथ दुश्मनों से भिड़ गए थे। 14 दिसंबर की उस शाम अंधाधुंध फायरिंग में दामोदर ने कई दुश्मनों को मार गिराया था।