चार महीने पहले शुरु हो जाती है प्रक्रिया
50 वर्षों से पुतला बनाने वाले विक्की राजपूत बताते हैं कि इसकी प्रक्रिया दशहरे से चार महीने पहले आरंभ हो जाती है। इसे बनाने के लिए पहले बांस को काटा जाता है। उससे ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद उस पर रंग-बिरंगे कागज लपेटे जाते हैं। चेहरे आदि को सजाकर उसे बिक्री के लिए बाजार में रखा जाता है।
उत्तराखंड तक होती है आपूर्ति
पुतला विक्रेता प्रदीप ने बताया कि उनकी ओर से बनाए गए पुतलों की आपूर्ति आसपास के जिलों के साथ ही उत्तराखंड तक होती है। पिछले साल के मुकाबले इस बार पुतलों की बिक्री ज्यादा हुई है। रावण दहन को देखने के लिए ज्यादा दूर न जाना पड़े, इसलिए लोग अपने गली-मोहल्ले में दहन करने के लिए छोटे कद के पुतलों की खरीदारी कर रहे हैं। इस वजह से भी बिक्री में उछाल आया है।
मुस्लिम कारीगर तैयार करते हैं रावण-कुंभकर्ण के पुतले
शहर में दशहरा पर कई जगह रावण के पुतले मुस्लिम कारीगरों द्वारा तैयार किए जाते हैं। साथ ही मेले में आतिशबाजी भी इन्हीं की ओर से होती है। श्री रानी महालक्ष्मीबाई रामलीला समिति चौधरी मोहल्ला की ओर से हार्टमन मैदान पर लगने वाले दशहरा मेले में सबसे बड़े 55 फुट के रावण का पुतला दहन किया जाएगा। वहीं, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले 45-45 फुट के होंगे और इन्हें रिमोट द्वारा जलाया जाएगा।
मेले के महाप्रबंधक श्रेयांश बाजपेयी ने बताया कि पुतलों में लगने वाले पटाखे पीलीभीत के आतिशबाज आतिफ और उनके पुत्र शाहिद बनाकर लगा रहे हैं। इस समय इन आतिशबाजों की यह तीसरी पीढ़ी है। पहले शमशाद आतिशबाज यही काम करते थे, अब उनके पुत्र व पौत्र कर रहे हैं। इसी तरह पर्वतीय सांस्कृतिक समाज की ओर से बीआई बाजार स्थित एमईएस फुटबाल मैदान पर भी 55 फुट का रावण का पुतला दहन किया जाएगा। वहीं, मेघनाद का 45 और कुंभकर्ण का पुतला 40 फुट का होगा।