आजकल विधान सभा चुनाव में प्रत्याशी करोड़ों रुपये फूंक रहे हैं। लग्जरी कारों का काफिला चुनाव क्षेत्र में दौड़ता नजर आता है। शराब और रुपये आदि वोटर को लुभाने को दिए जाते हैं। इसके साथ ही कई अन्य हथकंडे अपनाए जाते हैं। लेकिन वह एक जमाना था कि जब प्रत्याशी बैलगाड़ी, पैदल और जीप से ही पूरा क्षेत्र मथ देता था। वोटर बात का धनी होता था जिससे वादा कर दिया उसे ही वोट देता था। आजादी से पहले 1946 से चुनाव लड़ रहे बाबू राममूर्ति का अंदाज ही कुछ अलग था। बहेड़ी से कांग्रेस प्रत्याशी बने बाबू राममूर्ति एक ही जीप से प्रचार कर लेते थे। कभी बैलगाड़ी भी इस्तेमाल करनी पड़ी। उनसे जुड़े कुछ संस्मरण उनके पुत्र देवमूर्ति और चुनाव प्रचार में सहयोग करने वाले श्यामलाल कन्नौजिया से बातचीत के आधार पर प्रस्तुत हैं।
स्वतंत्रता के बाद संयुक्त प्रांत में बने मंत्री
राममूर्ति वर्ष 1946 में पहली बार एमएलए बने। संयुक्त प्रांत (अब यूपी) में वर्ष 1951 में बरेली से चुने गए पंडित गोविंद बल्लभ पंत की कैबिनेट में योजना, सिंचाई, विकास विभाग कार्यभार संभाला। प्रदेश भर में नहर सिस्टम को दुरुस्त कराना विकास में उनका बड़ा योगदान था। बरेली और आसपास जिलों में नहरों का उन्होंने जाल बिछवाया शारदा नदी जल से सिंचाई शुरू करायी। देव मूर्ति जी बताते हैं कि उस समय कैबिनेट मंत्री को सरकार माना जाता था। प्रशासन पूरा सम्मान देता था और मंत्री कभी किसी सरकारी कार्यालयों में चक्कर नहीं लगाता था। कार्यकर्ता पूरी तरह समर्पित था। चुनाव में वोट देने के बदले कोई मांग नहीं होती थी।
जनता खुद लड़ाती थी
चुनाव प्रचार में सारथी बनने वाले श्यामलाल कन्नौजिया बताते हैं कि बाबू जी खुद जीप चलाते थे। बीच बीच में वे हमसे चलवाते थे। कोई चालक और नौकर साथ नहीं चलता था। गांवों में लोग खाना आदि देते थे। पोस्टर बैनर बहुत कम थे, दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिह्न सभी याद रखते थे। कई जगह वोटर खुद चुनाव खर्च करते थे, संचार सिस्टम के नाम पर सिर्फ बेसिक फोन था। इसलिए कुछ हजार रुपये में ही निपटता था। पोलिंग बूथ के लिए कहीं रिक्शा और बैलगाड़ियां लगायी जाती थीं ज्यादातर वोटर पैदल पहुंचकर मतदान करता था।
कई नेता बनाए
कन्नौनिया ने बताया कि आजकल आगे बढ़ने वाले नेताओं टांग खींचते हैं लेकिन बाबू जी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री और मजबूत नेता के रूप में जाने वाले भानुप्रताप सिंह, पूर्व विधायक रामेश्वर नाथ चौबे, अशफाक अहमद जैसे लोगों को राजनीति में आगे बढ़ाया था। कार्यकर्ता का काम अपने खर्च पर कराना उनकी आदत थी। राममूर्ति 1969 में बीकेडी प्रत्याशी शफीक अहमद से हारे थे।