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Raksha Bandhan: बदायूं के 14 गांवों में कल मनाया जाएगा रक्षाबंधन, आल्हा ऊदल के जमाने से चली रहा ये परंपरा

Sat, 17 Aug 2024 12:45 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं

सार

बदायूं के कादरचौक में रानी चंद्रबली ने मुंहबोले भाई आल्हा से अपनी व राज्य की सुरक्षा की बात कही। लड़ाई रक्षाबंधन वाले दिन होनी तय थी। ऐसे में आल्हा ने अपने अधीन आने वाले 14 गांवों में एक दिन पहले ही रक्षाबंधन मनाने की घोषणा कर दी और अगले दिन युद्ध में शामिल होने चले गए। यह परंपरा आज तक निभाई जा रही है। 
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Raksha Bandhan 2024 - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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रक्षाबंधन देशभर में 19 अगस्त को मनाया जाएगा, लेकिन बदायूं के कादरचौक इलाके के 14 गांव ऐसे हैं, जहां रक्षाबंधन एक दिन पहले यानी 18 अगस्त ही मना लिया जाएगा। आल्हा ऊदल के जमाने से चली आ रही परंपरा को स्थानीय ग्रामीण पूरी शिद्दत के साथ निभाते चले आ रहे हैं। क्षेत्र के यह 14 गांव भंटेली कहलाते हैं।

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इलाके के बुजुर्गों का कहना है कि यहां पहले जमींदारी प्रथा लागू थी। स्थानीय जमींदार लोग महोबा शासक के अधीन थे। ठाकुर सोरन सिंह, वीरेंद्र सिंह, लाखन सिंह यादव की जमींदारी में 14 गांव आते थे, जो चंदेल वंशज के अधीन थे। 1182 ईसवीं में दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण कर दिया था। उस समय महोबा पर चंदेल शासक परमाल का राज था। 



आल्हा ने एक दिन पहले मनाया था रक्षाबंधन 
उनकी रानी चंद्रबली ने मुंहबोले भाई आल्हा से अपनी व राज्य की सुरक्षा की मांग की। लड़ाई रक्षाबंधन वाले दिन होनी तय थी। ऐसे में आल्हा ने अपने अधीन आने वाले 14 गांवों में एक दिन पहले ही रक्षाबंधन मनाने की घोषणा कर दी और अगले दिन युद्ध में शामिल होने चले गए।

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इन गांवों में एक दिन पहले मनाया जाता है रक्षाबंधन 
सदियों पुरानी परंपरा को आज भी कादरचौक, लभारी, चौडेरा, मामूरगंज, गढिया, ततारपुर, कचौरा, देवी नगला, सिसौरा, गनेश नगला, कलुआ नगला, किशूपरा गांव के लोग निभाते हैं और एक दिन पहले ही रक्षाबंधन मनाते हैं। 

जितेंद्र मिश्रा बताते हैं कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस बहाने अपने पूर्वजों की गाथा को भी याद कर लिया जाता है। चंदेल वंश, आल्हा और पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी रस्म है।     

सुधीर यादव ने कहा कि महोबा शासन में यहां के जमींदार आल्हा पक्ष के साथ थे। उसी युद्ध में जाने की वजह से एक दिन पहले त्योहार मनाया था, जो अब तक चला आ रहा है। आल्हा ऊदल के इतिहास से संबंधित पुस्तक में इसका प्रसंग छपा हुआ है। 
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