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पॉलिथीन बंद हों यह मेयर चाहें अवैध फैक्ट्रियां अफसर ‘चलवाएं’

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शहर को पॉलिथीन मुक्त बनाने के लिए जिला प्रशासन के अफसरान ने कई बार पॉलिथीन बंद करने के फरमान जारी किए। कई बार बाजार में महीनों तक पॉलिथीन की खरीद-फरोख्त बंद रही। लोगों के हाथों में कपड़ों के थैले दिखाई देने लगे, लेकिन आखिरकार हर बार यह अभियान फेल हो गया। वजह यह कि बाजार में तो पॉलिथीन को बंद करा दिया गया, लेकिन शहर में चल रही उन फैक्ट्रियों को नजरअंदाज कर दिया गया जो बगैर किसी रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस के पॉलिथीन का उत्पादन कर रही हैं। अब शहर के नए मेयर उमेश गौतम ने पॉलिथीन बंदी को अपना ‘दिसंबर रिवोल्यूशन’ घोषित किया है, लेकिन यह सवाल फिर सामने खड़ा है कि पॉलिथीन का अवैध उत्पादन बंद कराए बगैर बाजार में पॉलिथीन का इस्तेमाल आखिर कैसे बंद किया जाएगा। 
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दरअसल, शहर और देहात में पॉलीथिन का रोजाना का लगभग 12 करोड़ का अवैध कारोबार हो रहा है। इस कारोबार का टैक्स सरकार के खाते के बजाय अफसरों की ही जेबों में जा रहा है। परसाखेड़ा, पुराना शहर और रजऊ परसपुर समेत अन्य स्थानों पर पॉलीथिन की 10 से ज्यादा अवैध फैक्ट्रियां हैं, जो पॉलीथिन, कैरीबेग और अन्य प्लास्टिक उत्पादों की सप्लाई करती हैं। गैर लाइसेंस धारक फैक्ट्री मालिक बाहर बिना बोर्ड लगाए खाली पड़े खंडहर मकानों या पुरानी फैक्ट्रियों में पॉलीथिन का उत्पादन करा रहे हैं। 
पॉलीथिन बनाने वाली फैक्ट्रियों के न कभी प्रदूषण के मानक चेक होते हैं न उन पर कभी छापेमारी हुई। नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कर्मचारी पॉलीथिन अभियान के नाम पर शहामतगंज, मिर्ची वाली गली, सब्जी मंडी, फल मंडी, कुतुबखाना के बाजारों में ठेले या खोखे से चार या छह किलो पॉलीथिन जब्त करके खानापूरी करते रहे हैं। परसाखेड़ा के रोड नंबर एक पर बिना बोर्ड लगी बिल्डिंग में पॉलीथिन, प्लास्टिक और कैरीबैग बनाया जा रहा है। सीबीगंज से परसाखेड़ा तक पांच से छह फैक्ट्रियां पॉलीथिन बनाती हैं। प्रशासनिक स्तर पर कभी छापेमारी नहीं की गई। 
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एक भी फैक्ट्री रजिस्टर्ड नहीं
जागर जनकल्याण समिति के सचिव डॉ. प्रदीप कुमार ने काफी दिनों पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से आरटीआई के तहत पॉलीथिन की फैक्ट्रियों के बारे में जानकारी मांगी थी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अभी तक उन्हें यह जानकारी नहीं दे पाया। असल में ऐसी कोई फैक्ट्री रजिस्टर्ड है ही नहीं। अमर उजाला की पड़ताल में पता चला कि परसाखेड़ा में चार से पांच फैक्ट्रियां पैकिंग मैटेरियल के नाम से चल रही हैं। कारोबारी इसका माइक्रॉन ज्यादा होने की बात कहते हैं। इसी तरह की एक फैक्ट्री नेशनल हाईवे पर रजऊ परसपुर में चल रही है। इसे भी पैकिंग मैटीरियल के नाम से ही चलाया जा रहा है, हालांकि फैक्ट्री के मालिक अब इसके बंद होने की बात कह रहे हैं।

जगह बदलकर कारोबार
पुराना शहर में पॉलीथिन की दो फैक्ट्रियां हैं। दोनों ही फैक्ट्रियां एक-एक कमरे में चलती हैं। फैक्ट्री मालिक जगह बदलकर पॉलीथिन बनाकर बेचते हैं।  पॉलीथिन व्यापारी संघ के जयप्रकाश देवनानी का कहना है कि कैरीबैग तो दिल्ली और गाजियाबाद से आते हैं। फेरी वाले उनको अपने घरों से ले जाकर दुकानों पर सप्लाई करते हैं। थोक और फुटकर में रोजाना करीब 12 करोड़ की पॉलीथिन का कारोबार होता है। जनपद में पॉलीथिन के 50 थोक और 200 फुटकर व्यापारी हैं।

पर्यावरण की दुश्मन
पर्यावरण और सड़क पर घूमते आवारा पशुओं के लिए पॉलीथिन दुश्मन है। जमीन में दबने पर यह लंबे समय तक गलती नहीं है। इसके चलते कृषि भूमि धीरे-धीरे बंजर होने लगती है। पॉलीथिन जलाने पर कार्बन डाई आक्साइड बनती है, जो पर्यावरण को प्रदूषित करती है।

बेअसर रहे आदेश 
पॉलीथिन पर रोकथाम को लेकर सुप्रीम कोर्ट से लेकर सरकार तक के आदेश बरेली में बेअसर साबित हुए। कमिश्नर और डीएम ने भी कई बार आदेश जारी किए। प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नगर निगम को बंद कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मगर, हर बार अभियान हवाई साबित हुआ। पॉॅलीथिन अब भी बाजारों अब भी खुलेआम बिक रही है। 



बॉक्स
मेयर के रिवोल्यूशन पर संदेह 
नवनिर्वाचित मेयर उमेश गौतम ने दिसंबर में ही पॉलिथीन पर सख्ती से रोक लगाने की बात कही। उन्होंने पॉलीथिन बंदी को दिसंबर महीने के रिवोल्यूशन के तौर पर लिया है। उनका कहना है कि इसके लिए वह सबका सहयोग लेंगे। मगर अधिकारियों का रवैया तो उनके रिवोल्यूशन के पूरा होने पर संदेह पैदा करता है।

वर्जन
बरेली में पॉलीथिन की कोई फैक्ट्री पंजीकृत नहीं है। जो भी फैक्ट्रियां पॉलीथिन का उत्पादन कर रही हैं, वह सब अवैध हैं। इन फैक्ट्रियों का भौतिक सत्यापन कराकर कार्यवाही की जाएगी।  - एके चौधरी, क्षेत्रीय अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
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