बरेली। एनजीटी और सुप्रीमकोर्ट की रोक के बाद भी तमाम किसान पराली जलाकर प्रदूषण फैला रहे हैं। इसके पीछे किसानों का तर्क है कि पराली खेतों में ही नष्ट करने में दो-ढाई हजार रुपये एकड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। साथ ही करीब एक महीने का समय भी लगता है।खर्च और समय को बचाने के लिए ही किसान पराली खेतों में जलाकर न सिर्फ जमीन की उर्वरा शक्ति को कमजोर कर रहे हैं। साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसानों का कहना है कि अगर डीजल और उपकरणों पर उन्हें सब्सिडी दी जाए तो पराली जलाने का चलन कम हो सकता है।
वातावरण में छाया स्मॉग इन दिनों सबके लिए चिंता का विषय बना हुआ है। पटाखों के अलावा सबसे ज्यादा जिम्मेदार खेतों में पराली जलाने को ठहराया जा रहा है। दरअसल कमाई की आपाधापी में किसान समय बचाने के लिए कंबाइन से धान कटवाने के बाद खेत में बची पराली के गलने का इंतजार नहीं करते। क्योंकि खेत में इसकी जुताई करने के बाद इसके गलने में करीब एक महीने का समय लग जाता है। मगर अगली फसल बोने की जल्दी में किसान इसे खेत में ही जलाकर नष्ट कर देते हैं। इससे जमीन की ऊपरी सतह में गर्मी बढ़ने के साथ ही उसकी उर्वरा शक्ति कमजोर हो रही है। साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है।
कटाई कर पुआल से निकल सकता है खर्च
एक एकड़ में खड़े धान की पराली को जुताई करके उसे खाद के रूप में खेत में प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन इस पर दो-ढाई हजार रुपये का खर्च आता है। इसके अलावा मल्चर या स्रेडर मशीन के जरिये भी इसे छोटे टुकड़ों में बदलकर खाद बनाई जा सकती है लेकिन इस पर भी दो-ढाई हजार रुपये प्रति एकड़ खर्च आता है। मगर किसान अगर एक एकड़ धान को जड़ से कटवाकर पुआल निकाल लें तो इसका खर्च निकल सकता है। लेकिन इसमें मजदूर मिलने की समस्या के साथ ही समय भी ज्यादा लगता है।
संरक्षित करना भी बड़ी चुनौती
गेहूं के भूसे का किसान आसानी से भंडारण कर लेते हैं, लेकिन धान की पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर संरक्षित करना मुश्किल है। अधिकांश किसानों को इसके बारे में अभी भी जानकारी नहीं है, जिसके चलते इसके सुरक्षित भंडारण का प्रयास भी नहीं होता। हालांकि धान की कटाई करके अगर पुआल अलग निकाली जाए तो इसमें दिक्कत नहीं होती है।
सब्सिडी पर उपकरण खरीदना चुनौती
सरकार किसानों को कृषि उपकरण खरीदने पर सब्सिडी देती है। मगर किसानों का कहना है कि यह सब्सिडी पाना चुनौती से कम नहीं है। पराली काटने वाली स्रेडिंग मशीन की कीमत बाजार में करीब 90 हजार रुपये है, लेकिन जब किसान सब्सिडी की बात करते हैं तो इसकी कीमत बढ़कर सवा लाख रुपये से अधिक हो जाती है। यह कीमत क्यों बढ़ती है, इसका जवाब न विक्रता के पास है और न ही अफसराें के पास।
किसानों को मिले सब्सिडी
धान की पराली को खेत में सीधे जुताई करके पानी भरने के बाद छोड़ देना चाहिए। कुछ समय बाद दूसरी फसल बोने पर यह खाद का काम करती है। मगर एक एकड़ पराली को इस तरह गलाने पर दो-ढाई हजार रुपये का खर्च आता है। यह खर्च किसानों पर काफी भारी पड़ता है। सरकार को किसानों को डीजल पर सब्सिडी देनी चाहिए।
- अनिल साहनी, प्रगतिशील किसान
पराली काटकर क्या करे किसान
अन्य प्रदेशों में यह इंतजाम है कि किसान अगर पराली कटवा ले तो तमाम फैक्ट्रियां उसे खरीद लेती हैं, लेकिन बरेली जिले में ऐसी कोई फैक्ट्री नहीं है। साथ ही इस पर आने वाला खर्च भी ज्यादा है, जिसे किसानों को वहन करना मुश्किल है। ऐसे में तमाम किसान समय और रुपये बचाने के लिए पर्यावरण की परवाह किए बना उसे जला देते हैं।
- चौधरी जबर पाल सिंह, प्रगतिशील किसान
विशेषज्ञ की बात
नष्ट हो जाते हैं पोषक तत्व
दस क्विंटल पराली जलाने पर जमीन से 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 1.2 किलोग्राम गंधक, 20.25 किलोग्राम पोटाश नष्ट होती है। इसके अलावा जमीन में खेती के लिए मौजूद अन्य आवश्यक पोषक तत्व भी प्रभावित होते हैं, जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति कमजोर हो जाती है और जड़ों की बढ़वार प्रभावित होती है।
- डॉ. आरके सिंह, प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र