बरेली। अपने ही निर्वाचन क्षेत्र में अतिक्रमण की वजह से खत्म हो चुकी अरिल नदी को सिंचाई मंत्री रहते हुए धर्मपाल सिंह दोबारा जीवन नहीं दिला सके। सिंचाई विभाग के इंजीनियरों ने कई बार सर्वे करके डीपीआर बनाई, कई बार मनरेगा का बजट भी इसमें खपाया लेकिन वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से एनओसी के लिए केंद्र सरकार में पैरवी न हो पाने से नतीजा ढाक के तीन पात से ज्यादा नहीं हो पाया। माना जा रहा है कि काफी समय से डंप पड़ा यह प्रोजेक्ट अब पूरी तरह दफन हो जाएगा।
बदायूं, बरेली और रामपुर जिलों की सीमा में अरिल नदी की जलधारा कभी 137 किलोमीटर लंबी हुआ करती थी। बरेली में 57 और बदायूं में 65 किलोमीटर का सफर तय करके यह नदी दातागंज के जमालपुर मधुकर नवादा में रामगंगा में मिलती है। धर्मपाल सिंह के निर्वाचन क्षेत्र आंवला के भी करीब चार दर्जन गांवों से होकर भी यह नदी गुजरती है। कभी हजारों हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने वाली इस नदी का तमाम जगहों पर अतिक्रमण हो जाने की वजह से दम घुट चुका है। सिंचाई मंत्री रहते हुए धर्मपाल सिंह के दिलचस्पी लेने के बाद बाढ़ खंड की टीम ने इस नदी का सर्वे किया तो नदी की जलधारा उद्गम स्थल से सिर्फ 67 किलोमीटर तक ही मिली है। उसके आगे सिल्ट और खेतीबाड़ी की वजह से उसका वजूद खत्म हो चुका था।
इसके बाद करीब 30 करोड़ की लागत से नदी के कायाकल्प की योजना तैयार की गई। करीब डेढ़ साल पहले तत्कालीन डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह और सीडीओ सत्येंद्र कुमार ने खुद फावड़ा लेकर नदी की खुदाई शुरू की। मुख्य बजट पास होने की प्रत्याशा में मनरेगा से सैकड़ों मजदूर लगाकर लाखों रुपये की रकम खर्च की गई। इस बीच कई बार सर्वे के नाम पर सिंचाई विभाग की टीम ने भी पसीना बहाया लेकिन आखिरकार इस सारी कवायद का कोई नतीजा नहीं निकला। नदी की खुदाई शुरू करने के लिए अफसर वन एंव पर्यावरण मंत्रालय की एनओसी नहीं हासिल कर पाए। अब धर्मपाल सिंह के इस्तीफा देने के बाद सिंचाई विभाग इस नदी को पुनर्जीवित करने के लिए आगे कुछ करेगा, इसकी उम्मीद कम ही है।