कब्जे से प्रभावित हुए पुराने वासस्थल
शारदा नदी के पार का जंगल कभी नेपाली हाथियों के लिए प्रमुख वासस्थल माना जाता था, लेकिन वर्षों पहले वन भूमि पर अतिक्रमण शुरू होने के बाद स्थिति बदलने लगी। शुरुआती दौर में वन विभाग ने अतिक्रमण रोकने के प्रयास किए, लेकिन बाद में कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। संयुक्त सीमांकन की प्रक्रिया के बीच अतिक्रमण का दायरा बढ़ता गया।
वासस्थल प्रभावित होने से हाथी उन्हीं इलाकों में खेतों को नुकसान पहुंचाने लगे, जहां पहले उनकी मौजूदगी रहती थी। अधिकारियों के स्तर से भी कई बार इस समस्या के संकेत मिले, लेकिन हाथियों के पारंपरिक रास्तों को सुरक्षित करने के लिए ठोस समाधान नहीं हो सका। अब हाथी नदी पार कर बड़े जंगलों की ओर आने लगे हैं, जिससे मानव-हाथी संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है।
मुआवजे की प्रक्रिया भी धीमी
नेपाली हाथी किसानों की फसलों को उजाड़ते हैं। इससे किसान भी परेशान है। किसानों का आरोप है कि विभागीय मुआवजे की प्रक्रिया भी धीमी है। विभाग की मानें तो वर्ष 2021 में कृषि फसलों के नुकसान का वर्ष 2025 में मुआवजा दिया गया। इसमें करीब 282 किसानों को 32 लाख रुपये की धनराशि दी गई। इस बार भी विभाग की ओर से करीब 80 किसानों को चिह्नित किया गया, जिनकी फसलों को हाथियों ने नुकसान पहुंचाया है। विभाग ने इसकी रिपोर्ट बनाकर उच्च स्तर पर भेजी है।
एलीफेंट रिजर्व पर अमल का इंतजार
हाथियों की दशकों पुरानी आवाजाही को देखते हुए उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने की दिशा में पूर्व में आदेश जारी किए गए थे। इसमें पीलीभीत टाइगर रिजर्व के अलावा दुधवा और कर्तनियाघाट को भी शामिल किया गया है। हालांकि, इस पर अभी तक धरातल पर ठोस अमल शुरू नहीं हो सका है।
जानकारों का कहना है कि एलीफेंट रिजर्व के प्रभावी क्रियान्वयन से हाथियों के प्राकृतिक आवागमन वाले क्षेत्रों को सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है। कॉरिडोर और वासस्थल को बचाने के साथ अतिक्रमण पर प्रभावी कार्रवाई की जाए तो हाथियों के आबादी और खेतों की ओर भटकने की समस्या को कम किया जा सकता है।