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पीलीभीत टाइगर रिजर्व: पुराने कॉरिडोर पर अतिक्रमण से भटक रहे हाथी, आबादी क्षेत्र में पहुंचा रहे नुकसान

Sun, 20 Sep 2026 01:52 PM IST
Mukesh Kumar फखरूल इस्लाम, संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत

सार

पीलीभीत टाइगर रिजर्व में नेपाली हाथियों के पारंपरिक रास्ते अतिक्रमण के कारण बाधित हो गए हैं। इससे हाथी आबादी और खेतों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे मानव-हाथी संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है। 
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खेतों में घूमते नेपाली हाथी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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नेपाल से तराई के जंगलों में आने वाले हाथियों का पीलीभीत टाइगर रिजर्व की बराही और हरीपुर रेंज से दशकों पुराना रिश्ता रहा है। हाथी जंगल में पहुंचने के बाद कुछ दिन विचरण करते थे और फिर वापस चले जाते थे। हालांकि, वर्षों से वन भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण और मानवीय दखल के कारण हाथियों के आवागमन वाले रास्ते प्रभावित हुए हैं। इससे हाथी भटककर आबादी और खेतों की ओर पहुंचने लगे हैं। 

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शारदा नदी के पार रमनगरा, गुन्हान, ढकिया ताल्लुके महाराजपुर और भूरा गोरख डिब्बी का क्षेत्र भी हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर के रूप में जाना जाता था। पिछले छह माह से नेपाली हाथियों का बराही, महोफ और माला रेंज के जंगल में चहलकदमी का सिलसिला जारी है। जंगल के अंदर विभागीय संसाधनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं, जंगल से बाहर निकलकर भी हाथी फसलों और झोंपड़ियों को रौंद रहे हैं। हाथियों की निगरानी वन विभाग के लिए चुनौती बनी हुई है। विभाग की ओर से निगरानी के लिए टीमें लगाई गई हैं। 

डीएफओ भरत कुमार डीके के मुताबिक, हाथियों का रूट तो पुराना है। इसकी पूरी रिपोर्ट बनाकर उच्च अधिकारियों को भेजी जा रही है। मुआवजे की प्रक्रिया पर भी अमल किया जा रहा है। वर्तमान में हाथी शारदा पार जा चुके हैं। 

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कब्जे से प्रभावित हुए पुराने वासस्थल
शारदा नदी के पार का जंगल कभी नेपाली हाथियों के लिए प्रमुख वासस्थल माना जाता था, लेकिन वर्षों पहले वन भूमि पर अतिक्रमण शुरू होने के बाद स्थिति बदलने लगी। शुरुआती दौर में वन विभाग ने अतिक्रमण रोकने के प्रयास किए, लेकिन बाद में कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। संयुक्त सीमांकन की प्रक्रिया के बीच अतिक्रमण का दायरा बढ़ता गया। 

वासस्थल प्रभावित होने से हाथी उन्हीं इलाकों में खेतों को नुकसान पहुंचाने लगे, जहां पहले उनकी मौजूदगी रहती थी। अधिकारियों के स्तर से भी कई बार इस समस्या के संकेत मिले, लेकिन हाथियों के पारंपरिक रास्तों को सुरक्षित करने के लिए ठोस समाधान नहीं हो सका। अब हाथी नदी पार कर बड़े जंगलों की ओर आने लगे हैं, जिससे मानव-हाथी संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है।

मुआवजे की प्रक्रिया भी धीमी
नेपाली हाथी किसानों की फसलों को उजाड़ते हैं। इससे किसान भी परेशान है। किसानों का आरोप है कि विभागीय मुआवजे की प्रक्रिया भी धीमी है। विभाग की मानें तो वर्ष 2021 में कृषि फसलों के नुकसान का वर्ष 2025 में मुआवजा दिया गया। इसमें करीब 282 किसानों को 32 लाख रुपये की धनराशि दी गई। इस बार भी विभाग की ओर से करीब 80 किसानों को चिह्नित किया गया, जिनकी फसलों को हाथियों ने नुकसान पहुंचाया है। विभाग ने इसकी रिपोर्ट बनाकर उच्च स्तर पर भेजी है।
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एलीफेंट रिजर्व पर अमल का इंतजार
हाथियों की दशकों पुरानी आवाजाही को देखते हुए उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने की दिशा में पूर्व में आदेश जारी किए गए थे। इसमें पीलीभीत टाइगर रिजर्व के अलावा दुधवा और कर्तनियाघाट को भी शामिल किया गया है। हालांकि, इस पर अभी तक धरातल पर ठोस अमल शुरू नहीं हो सका है। 

जानकारों का कहना है कि एलीफेंट रिजर्व के प्रभावी क्रियान्वयन से हाथियों के प्राकृतिक आवागमन वाले क्षेत्रों को सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है। कॉरिडोर और वासस्थल को बचाने के साथ अतिक्रमण पर प्रभावी कार्रवाई की जाए तो हाथियों के आबादी और खेतों की ओर भटकने की समस्या को कम किया जा सकता है।
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