बरेली। अरिल नदी का जल तंत्र प्रभावित होने से तटीय गांवों के लोग वर्षों से बीमार होते रहे, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इसकी वजह नहीं तलाश पाया। महकमा स्वास्थ्य शिविर लगाकर दवाएं बांटने तक सिमटा रहा। अब प्रशासन और वर्ल्डवाइड फंड फॉर इंडिया (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के सर्वे में तटवर्ती गांवों के भू-जल में कुल घुलित ठोस (टीडीएस) की मात्रा 10 गुना तक अधिक मिलने पर इस राज से पर्दा उठा है।
दरअसल, टीम ने वर्ष 2018 में अरिल नदी के किनारे बसे दस गांवों के भू-गर्भ जल का स्तर का मापा। यह सामान्य से काफी नीचे मिला। जिले के जिन तीन ब्लॉक से होते हुए अरिल नदी निकल रही है, भू-गर्भ जल विभाग की रिपोर्ट में भी ये तीनों ब्लॉक संवेदनशील श्रेणी में शामिल हैं। भू-गर्भ जल का स्तर लगातार नीचे जाने से पानी का टीडीएस बढ़ना स्वाभाविक है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े तो स्वास्थ्य विभाग ने शिविर लगाकर इलाज तो किया, लेकिन बीमारी की वजह जानने की जहमत नहीं उठाई। अब प्रशासन के प्रयास के बाद अरिल को सांसें और स्थानीय लोगों को राहत मिलने के आसार नजर आ रहे हैं।
90 फीसदी बीमारियों की वजह है दूषित जल
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. वैभव शुक्ला ने बताया कि 90 फीसदी बीमारियां असंतुलित खानपान और दूषित पानी के सेवन से होती हैं। अगर घरों में दूषित पानी आ रहा है तो उसे उबाल कर सेवन करना चाहिए। लगातार दूषित पानी के सेवन से पेट, आंत समेत अन्य संबंधित बीमारियां होने की आशंका रहती है।
जल संचयन पर होगा काम
मुख्य विकास अधिकारी देवयानी ने बताया कि नदी के पानी का बहाव कम होने का मुख्य कारण भू-गर्भ जल स्तर का घटना है। इसमें सुधार के लिए तीनों ही ब्लॉक में वेटलैंड बनाने के साथ वर्षा जल संचयन के साधन भी विकसित किए जाएंगे। स्वास्थ्य विभाग को भी समय-समय पर स्थानीय ग्रामीणों की सेहत की जांच करने के लिए कहा जाएगा।