पहले नेताओं को उनके व्यक्तित्व के आधार पर वोट मिलता था। हमारा परिवार फिरोजाबाद का रहने वाला है। मेरे बड़े भाई स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र पालीवाल दो बार फिरोजाबाद शहर से विधायक रहे। पहली बार भाई विधायक बने तब मैं दो साल का था, लेकिन 1952 में दूसरी बार वह कांग्रेस से विधायक चुने गए तब मेरी उम्र 18 साल हो गई थी। लिहाजा उस चुनाव की थोड़ी बहुत जिम्मेदारियां मुझे भी मिलीं। इस चुनाव में भाई साहब सिर्फ 496 रुपये खर्च करके विधायक बन गए थे। अब तो सियासत से नैतिकता खत्म होती जा रही है।जो नेता धर्म और जाति के नाम पर जितना अच्छा बांटना जानता है, उतना ही कामयाब नेता बन जाता है, लेकिन जिस दिन जनता ऐसे नेताओं को समझकर वोटिंग करने लगेगी, उनका पतन हो जाएगा।
अमर उजाला से बातचीत में समाजसेवी जगदीश चंद्र पालीवाल ने नेताओं और जनता के बीच बढ़ रही दूरी पर चिंता व्यक्त की। बोले, राममूर्ति जी बहेड़ी से विधायक रहने के दौैरान 1952 में कैबिनेट मंत्री रहे। इसके बाद हमने उन्हें कई चुनाव लड़ाए। वह बरेली लोकसभा सीट से सांसद भी रहे। राममूर्ति की ईमानदारी की आज भी मिसाल दी जाती है। इनके चुनाव में मामूली रकम ही खर्च होती थी। 1967 में जगदीश सरन बरेली सिटी से विधायक चुने गए। इसके बाद राम सिंह खन्ना शहर विधायक रहे। यह ऐसे नेता थे कि जिस अफसर को फोन करके काम बता देते थे, उसकी मना करने की हिम्मत नहीं होती थी, लेकिन वे राशन की दुकानों की किसी की सिफारिश नहीं करते थे। अपराध करने वाला तो इन नेताओं के पास तक नहीं भटकता था। कार्यकर्ता इन नेताओं को चंदा देकर चुनाव लड़ाते थे, इसलिए ज्यादा खर्च नहीं होता था। मोहल्ले और गांव के एक-दो लोगों से मिलकर ही सबके वोट मिल जाते थे।
ताऊ के साथ बरेली आए थे पालीवाल
जेसी पालीवाल मूल रूप से आगरा की फतेहाबाद (फिरोजाबाद) तहसील के मेहरा चौधरी गांव रहने वाले हैं। बाद में उनका परिवार फिरोजाबाद में बस गया। पालीवाल के ताऊ यहां एयरफोर्स में नौकरी करते थे। पढ़ाई के लिए वह ताऊ के पास आकर रहने लगे। इसके बाद रेलवे में नौकरी मिल गई और फिर यहीं के होकर रह गए। इन दिनों वह कल्चरल एसोसिएशन समेत कई सामाजिक संस्थाओं का नेतृत्व करके लोगों की सेवा कर रहे हैं।