जिला प्रशासन ने बुधवार से ऑपरेशन मुस्कान कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत रेलवे स्टेशन, रोडवेज बस स्टैंड, होटल और ढाबों पर बच्चों की तलाश की जाएगी। उन्हें बंधनमुक्त किया जाएगा। इस प्रकार के सरकारी अभियान कई बार चले मगर न बाल श्रम रुका न बचपन वापस आया। एक संस्था की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि जिले में 14 साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत बच्चे ईंट भट्टों पर काम कर रहे हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति ने उन्हें यह काम करने को मजबूर किया है।
यह सर्वेक्षण जागो समाज समिति के स्वयं सेवक एकाग्र शर्मा की अगुवाई में जिले भर में किया गया। 12 वीं में पढ़ने वाले एकाग्र शर्मा ने बताया कि आंकड़ों का एकत्रीकरण और वर्गीकरण आदि तकनीकी काम एमजेपी रूहेलखंड विश्वविद्यालय के विधि संकाय के प्रोफेसर अमित सिंह के निर्देशन में किया गया। टीम ने पाया कि ईट बनाने वाले फड़ों पर 22 प्रतिशत लड़के और 13 प्रतिशत लड़कियां काम कर रही हैं। उनकी उम्र 14 वर्ष से भी कम है। इनमें से कोई बच्चा स्कूल नही जाता। ये बच्चे पढ़ना तो चाहते हैं मगर परिवार के दबाव और आर्थिक कारणों से कभी स्कूल नहीं जा सके। ईंट भट्टों पर 15 नवंबर से 15 जून तक ईंट थापने का काम चलता है। ये बच्चे यहां रोजाना 12 से 14 घंटे लगातार काम करते हैं।
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सरकारों को जागना होगा
जागो समाज समिति के अध्यक्ष डॉ. शिव कुमार शर्मा ने बताया कि ईंट भट्टों पर काम करने वाले बच्चों के परिवार के लोगों से बात की गई है। उनसे बच्चों के भविष्य के लिए आगे आने का आह्वान किया गया है। लेकिन वे गरीबी का हवाला देते हैं। बाल श्रम पर रोक लगाने के लिए प्रदेश और केंद्र सरकार को पत्र लिखकर पूरी रिपोर्ट भेजी गई है। सरकार से मांग की है कि गरीब परिवारों को मुफ्त बीमा, आर्थिक सहायता प्रदान की जाए। इस सर्वेक्षण का विषय चाइल्ड हुड इन मेड ए स्टडी आफ ब्रिक मेकिंग फेमलीज ऑफ डिसट्रिक बरेली था। इसका प्रकाशन ग्लोबल जनरल ऑफ ला के आगामी अंक में किया जाएगा।