जमीयत उलमा-ए-हिंद के महानगर अध्यक्ष हाफिज मोहम्मद आसिफ, महासचिव मोहम्मद आकिल के अलावा नफीस अहमद, नदीम उल हसन ने कहा कि सहारनपुर की 700 मस्जिदों में बरेलवी मसलक की सिर्फ एक मस्जिद है। दिल्ली की 1800 मस्जिदों में सात मस्जिदें हीं बरेलवी मसलक की है। लखनऊ की 1700 मस्जिदों में से 13 मस्जिदें बरेलवियों की हैं। मेरठ में 650 मस्जिदों में से एक भी बरेलवी मसलक की नहीं है। लुधियाना में 52 में से सिर्फ तीन ही मस्जिदें है। इन सभी जगहों पर देवबंदी और बरेलवी मसलक के लोग शांति से रहते हैं। कहीं कोई विवाद नहीं है। यहीं क्यों मस्जिद पर कब्जे की बात की जा रही है।
जामा मस्जिद सराय खाम में पत्रकारों से बात करते हुए संयुक्त रुप से देवबंदियों ने कहा कि दरगाहों और खानकाहों की हम भी इज्जत करते हैं। लेकिन कुछ लोग निजी फायदों के लिए हमें बदनाम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर मुसलमानों को अलग करने में लगे हैं। हमें किसी वक्फ संपत्ति का लालच नहीं है। हमें तो नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद चाहिए। उन्होंने कहा कि इमाम वही होता है जिसे नमाजी दिल से कु बूल करें। मौलाना तसलीम मियां के 15 जून को नमाज पढ़ने के ऐलान के सवाल पर उनका कहना था कि हमें प्रशासन पर पूरा भरोसा है। जब तक फैसला नहीं आ जाता है। तब तक हमारी तरफ से भी कोई नमाजी नमाज नहीं पढ़ेगा। बरेलवी और देवबंदी दोनों की सुन्नी हैं। केवल सुन्नी और शिया दो ही संप्रदाय हैं। हज को जाते वक्त भी सुन्नी और शिया ही दस्तावेजों में लिखा जाता है। उन्होंने कहा कि जो लोग यह कहते हैं कि दिल्ली की जामा मस्जिद का इमाम बदल देंगे। वे जंतर मंतर पर धरना देने जाएं तो इमाम बदलवा दें। जामा मस्जिद पर कब्जा कर लें। शहर के कई ऐसी मस्जिद हैं जहां काफी गंदगी है। वहां जाकर कब्जा कर लें। इस दौरान प्रेस कांफ्रेस करने वालों में से ही एक शख्स ने कहा कि मस्जिद कब्जाने की कोशिश हुई तो वह भी ईंट से ईंट बजा देंगे। दूसरे शहरों में हम भी बरेलवी मसलक की मस्जिदों को कब्जा लेंगे। लेकिन देवबंदी मसलक के बाकी लोगों ने इसका समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि यह कहने वाली अपनी राय हो सकती है। इसे सामूहिक राय नहीं कहा जा सकता है। हम शांति व्यवस्था चाहते हैं। इस मौके पर खालिद, शारिब आदि भी मौजूद रहे।