लगातार बढ़ रहे प्रदूषण रोकने के लिए कार्बन उत्सर्जन सहित दुनिया भर की कागजी कवायदें हो रही हैं लेकिन आधुुनिक युग को तेज रफ्तार देने वाली मोबाइल से होने ‘एम पाल्यूशन’ पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मोबाइल का अधिक प्रयोग लोगों को मानसिक रोगी तो बना ही रहा है वहीं मोबाइल टावरों से होने वाले रेडिएशन से प्रतिरोधक क्षमता कम होने के साथ अपंगता का भी खतरा बढ़ रहा है।
मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडियोएक्टिव तरंगें फोन तक पहुंचती है। भले ही फोन स्विचआफ क्यों न हो। मानक से अधिक स्पेसिफिक एब्जार्प्शन रेट (एसएआर) शरीर को नुकसान पहुंचाता है और मोबाइल टावरों का रेडिएशन मानक से दो गुने तक अधिक हैं। 120 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले शहर के आठ लाख मोबाइल धारकों के लिए करीब 650 मोबाइल टावर लगाए गए हैं। यानी हर 18.46 हेक्टेयर क्षेत्रफल में रहने वाले बाशिंदे एक मोबाइल टावर से होने वाले रेडिएशन के खतरे की जद में है। हमारा शरीर दो किलोवाट तक का रेडिएशन सहन कर सकता है। एक मोबाइल कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापे जाने के अनुरोध के साथ बताया कि इन टावरों से हर रोज 5-6 किलोवाट रेडिएशन होता है जो बेहद खतरनाक हैं लेकिन इस संबंध में कार्रवाई की कोई गाइड लाइन नहीं बनी है।
रेडिएशन से बचाव के तरीके
मोबाइल खरीदने से पहले हैंडसेट का एसएआर जानें
लैंडलाइन फोन नुकसानदायक नहीं
नेटवर्क और बैटरी कम होने पर रेडिएशन बढ़ता है, दोनों सही तब ही बात करें
मोबाइल को अपने शरीर से दूर रखें
बैटरी 15 फीसदी से कम हो तो बात न करें, रेडिएशन अधिक होता है
मोबाइल को सुरक्षात्मक उपकरणों रेडिएशन कम किया जा सकता है
मोबाइल टावर के रेडिएशन के दायरे में आने वाले लोगों में कैंसर, त्वचा, शारीरिक अपंगता, न्यूरो, कान और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियां होने का खतरा अधिक रहता है। मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल घातक है।
- डा. वीके धस्माना, फिजीशियन जिला अस्पताल
भारत सरकार ने हाल में ही मोबाइल कंपनियों को 1.6 किलोवाट स्पेसिफिक एब्सोर्पशन रेट (एसएआर) से कम रेडिएशन वाले मोबाइल बनाने के निर्देश दिए हैं। कुछ कंपनियों ने ऐसे मोबाइल का निर्माण शुरू भी कर दिया है। ये रेडिएशन की दृष्टि से नुकसानदेह नहीं है।
मणिराम, जीएम बीएसएनएल