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रोग प्रतिरोधक क्षमता ही निपट पा रही है कोरोना से

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नोएडा की कंपनी में नौकरी करने वाले सुभाषनगर के युवक को संक्रमित करने के साथ 27 मार्च को बरेली में शुरू हुआ कोरोना का सफर वैसे तो सभी के लिए इन छह महीनों में दहशत, मुसीबत और आशंकाओं की एक लंबी दास्तां बन चुका है लेकिन शुरुआत से लेकर अब तक इस जानलेवा वायरस ने जिस तरह विशेषज्ञों के तमाम अनुमान ध्वस्त किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। शुरू में आशंका जताई गई थी कि पिछड़े और निम्न वर्ग की घनी आबादी वाली बस्तियों में कोरोना सबसे ज्यादा घातक साबित होगा लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। रईसी और साधन संपन्नता का मुगालता दूर करते हुए कोरोना ने सबसे ज्यादा खतरनाक रूप पॉश इलाकों में दिखाया। शहर के सिविल लाइंस में सबसे ज्यादा तादाद में लोग इसकी चपेट में आए। पुराना शहर और गंगापुर-मौलानगर जैसी बस्तियों को कोरोना जैसे बस छूकर निकल गया। ग्रामीण इलाकों की कहानी भी इससे कुछ ज्यादा अलग नहीं है। कोरोना संक्रमण के अब तक के आंकड़ों पर चकित विशेषज्ञ इसे अब रोग प्रतिरोधक क्षमता का कमाल बता रहे हैं।
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उच्च और निम्न वर्ग पर हमलावर
कोरोना ने मध्यम वर्ग को छोड़ा
विशेषज्ञों के मुताबिक मध्यवर्गीय लोगों ने ही दिखाई सबसे ज्यादा जागरूकता और सतर्कता
बरेली। कोरोना संक्रमण पर स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों का निष्कर्ष है कि उसने सबसे ज्यादा हमला उच्च और निम्न वर्ग पर ही किया है। मध्यम वर्ग में संक्रमण की दर सबसे कम रही है। अलग-अलग विशेषज्ञों की नजर में वैसे तो इसके अलग-अलग कारण हैं लेकिन इस बात पर वे एकमत हैं कि मध्यम वर्ग ने ही कोरोना के इस भयावह दौर में सर्वाधिक सतर्कता दिखाई है। निम्न वर्ग के लिए उसकी मजबूरियां और उच्च वर्ग के लिए उसके अति आत्मविश्वास ही कहीं न कहीं कोरोना की चपेट में आने का कारण बना है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर डॉक्टर भी सहमत हैं। उनका मानना है कि शहर के भीड़भाड़ से भरे बाजार कोरोना संक्रमण फैलने के लिए सबसे ज्यादा मददगार साबित हुए हैं। उच्च आय वर्ग के लोग कारोबारी समुदाय से ही ज्यादा हैं, दूसरी तरफ निम्नवर्गीय लोग भी मजदूर तबके से हैं जिनकी भीड़भाड़ में रहना और दूसरों के संपर्क में आना मजबूरी है। बाजारों में दो ही तरह के लोग ही 15 मिनट से ज्यादा संपर्क में रहते हैं, एक तो कारोबारी और दूसरे मजदूर। लिहाजा उन्हीं में संक्रमण फैलने की सबसे ज्यादा आशंका रहती है। इसी वजह से बाजार बंद कराए गए थे। जब तक लॉकडाउन रहा, संक्रमण की रफ्तार काफी हद तक काबू में रही और अनलॉक होते ही बेकाबू हो गई। चूंकि संक्रमण अभी थमा नहीं है लिहाजा एहतियात के अलावा कोरोना से बचने का कोई रास्ता भी नहीं है।
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130 मौत.. गांवों के मुकाबले शहर में
ज्यादा जानलेवा साबित हुआ कोरोना
विशेषज्ञों के मुताबिक शहर में जांच का औसत भी ज्यादा
आंकड़ों के मुताबिक कोरोना से मृत्यु की दर भी शहर में ज्यादा है। इसके पीछे चिकित्सकों का तर्क है कि शहर में जागरूकता ज्यादा होने के कारण लोग लक्षण दिखाई देते ही जांच करा लेते हैं लेकिन देहात में बुखार जैसे लक्षण दिखने के बाद भी ज्यादातर लोग सामान्य दवाओं का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। जांच न कराने की वजह से यह पुष्टि नहीं हो पाती कि वे कोरोना संक्रमित हैं या नहीं। शहर के लोगों के ज्यादा जांच कराने से संक्रमण की दर भी शहर में ज्यादा नजर आ रही है। शहरी कोरोना संक्रमितों की मौत भी रिकॉर्ड में दर्ज हो रही है। जिले में अब तक 130 संक्रमितों की मौत हो चुकी है। पिछले दिनों जिले के नोडल अफसर नवनीत सहगल ने भी गांवों में सर्विलांस को बेहतर बनाने के निर्देश दिए थे।
सारा खेल इम्युनिटी का..
जो अंदरूनी तौर पर मजबूत, उन्हें नहीं
होता कोरोना संक्रमण का एहसास
आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सत्येंद्र सिंह के मुताबिक निम्नवर्गीय लोगों का कोरोना टेस्ट में ज्यादा भरोसा नहीं है। पॉजिटिव पाए जाने पर रोजी-रोटी छिन जाने की आशंका इसकी एक वजह हो सकती है लेकिन अपनी जगह यह बात भी ठीक है कि संक्रमित होने के बावजूद मेहनतकश होने की वजह से उनमें लक्षण प्रकट नहीं होते हैं लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उनके संपर्क में आने वाले लोग भी अंदरूनी तौर पर इतने ही मजबूत हों। कोरोना वायरस जब ऐसे में अंदरूनी तौर पर कमजोर लोगों के शरीर में पहुंचता है तो उनमें जल्द ही लक्षण दिखने लगते हैं। इन लोगों को कोविड टेस्ट कराने में भी कोई समस्या नहीं होती लिहाजा आंकड़ों में उन्हीं की संख्या ज्यादा दिखाई देती है। माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट डॉ. राहुल गोयल का भी कुछ यही मानना है। उनके मुताबिक उच्च वर्ग के लोग लक्षण दिखते ही फौरन जांच कराते हैं, इसके उलट निम्न वर्ग के लोग टेस्ट कराने से बचते हैं। कोरोना वायरस उनके शरीर में पहुंचता भी है तो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता का मुकाबला नहीं कर पाता।
उच्च वर्ग में तेजी से बढ़ता है वायरल लोड
माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट डॉ. राहुल गोयल डॉ. गोयल कहते हैं कि मजदूर वर्ग दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करता है लिहाजा आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी मजबूत होती है। ये लोग आमतौर पर तमाम तरह के वायरस के संपर्क में आते हैं इसलिए शरीर में एंटीबॉडी बनने की क्षमता भी अधिक होती है। उच्च वर्ग के वे लोग जो कम शारीरिक श्रम करते हैं और बचपन से ही मामूली बीमार होते ही दवाएं खाने के आदी होते हैं, उनका शरीर वायरस के हमले के लिए तैयार नहीं होता। इसीलिए हल्का संक्रमण भी उनमें तेजी से फैलता है।
शहर
207 संक्रमित सिर्फ
सिविल लाइंस में
दूसरे पॉश इलाकों में संक्रमित अपेक्षाकृत ज्यादा
सिविल लाइंस शहर का पॉश इलाका है जहां बड़े-बड़े शोरूम, अस्पताल, बैंक के साथ उच्चाधिकारी, उद्यमी और कारोबारी रहते हैं। यहां मिले ज्यादातर संक्रमित लक्षण युक्त हैं। सिविल लाइंस के रामपुर बाग में लगातार संक्रमित मिल रहे हैं। सिविल लाइंस के अलावा शहर के बाकी इलाकों में भी उच्चवर्गीय लोगों के संक्रमण की चपेट में आने की संख्या ज्यादा है।
189 संक्रमित इज्जतनगर में
मध्यवर्ग को यहां भी राहत
ये संक्रमित इज्जतनगर के फरीदापुर, सैदपुर हॉकिंस, कर्मचारी नगर जैसे इलाकों में मिले हैं। कहीं रईस वर्ग तो कहीं निम्नवर्गीय आबादी चपेट में आई है। मध्यम वर्ग में संक्रमितों की संख्या नाममात्र की है।
निम्नवर्गीय शहरी बस्तियों में
कोरोना का हमला बेअसर
शहर का मौलानगर और गंगापुर इलाका कोरोना संक्रमण के मामले में तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। दोनों जगह मजदूर तबका ज्यादा है। बड़े कारोबारियों के गोदामों में लोडिंग-अनलोडिंग के लिए प्रवासी मजदूर भी आते रहते हैं। इन इलाकों में मिले संक्रमितों में ज्यादातर लक्षणविहीन मिले।
देहात
437 संक्रमित फरीदपुर में
प्रवासियों ने फैलाया कोरोना
फरीदपुर के सिर्फ फर्रखपुर और परा मोहल्ले में ही इनमें से ज्यादातर संक्रमित मिले है। परा मोहल्ले में रईस वर्ग की बहुलता है तो फर्रखपुर में मजदूर तबका ज्यादा है। कस्बे में काफी ज्यादा प्रवासी हैं। इन्हीं के आने से संक्रमण का ग्राफ बढ़ना शुरू हुआ था।
360 संक्रमित भोजीपुरा
की निम्नवर्गीय आबादी में
भोजीपुरा में 360 संक्रमित विभिन्न इलाकों में मिले हैं। तीसरे नंबर पर फतेहगंज पश्चिमी और चौथे पर मीरगंज है। तीनों इलाकों में निम्न वर्ग के लोग ज्यादा संक्रमित हैं। काफी प्रवासी भी दूसरे शहरों से संक्रमण लेकर लौटे।
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