अब वीडियो का मालिकाना हक बदलना और उसे चुराकर अपने नाम करना आसान नहीं होगा। वाटर मार्किंग प्रोग्रामिंग डालने के बाद वीडियो में छेड़छाड़ नहीं हो सकेगी। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस विभाग के डॉ. एसएस बेदी ने यह तकनीक विकसित की है। डॉ. एसएस बेदी इस विषय से संबंधित अपना शोध पत्र कनाडा और यूक्रेन में पढ़ेंगे। व्हट्सऐप और फेसबुक से कोई भी वीडियो उठाकर लोग उसे अपना बताने लगते हैं। उसका मालिकाना हक भी ले लेता है, लेकिन अगर किसी वीडियो में सॉफ्टवेयर से वाटर मार्किंग कर दी जाएगी तो उसका मालिकाना हक नहीं बदल सकेगा। यही नहीं, इसके बाद उस वीडियो में न कुछ नया जुड़ सकेगा और न उसमें से कुछ हटाया जा सकेगा। जैसे ही वीडियो में कोई छेड़छाड़ होगी, तुरंत उसके मालिक को पता चल जाएगा। इंटरनेट और साइबर सिक्योरिटी के लिए डॉ. एसएस बेदी ने यह तकनीक विकसित की है। डॉ. एसएस बेदी को कनाडा के ऑन्टेरियो यूनिवर्सिटी में 21-24 अगस्त को होने वाली इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में बुलाया गया है। वहां पर वह वाटर मार्किंग टेक्नोलॉजी से संबंधित शोध वर्क के बारे में बताएंगे। इसके साथ ही उन्हें यूक्रेन की मिनिस्ट्री ऑफ एजूकेशन एंड साइंस से भी निमंत्रण मिला है। वह यूक्रेन में छह से 10 अक्टूबर से तक होने वाली इंटरनेशनल साइंटिफिक एंड टेक्निकल कॉन्फ्रेंस में इस टेक्नोलॉजी के बारे में बताएंगे। इससे पहले वह लंदन में होने वाली वर्ल्ड कांग्रेस इंजीनियरिंग में अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर चुके हैं। इसमें इस तकनीक से संबंधित पेपर को बेस्ट पेपर अवार्ड मिला था। इसके बाद उन्होंने इस पर आगे काम करना शुरू किया।
डॉ. एसएस बेदी ने बताया कि मेडिकल साइंस, इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में इसका उपयोग है। वार्किंग मार्किंग एक तरह की तकनीक है। सॉफ्टवेयर के माध्यम से इसका उपयोग किया जाता है। गोपनीय सूचनाओं के आदान प्रदान में इसका काफी उपयोग है। नेटवर्क एंड इंफार्मेशन सेक्युरिटी के अंतर्गत सूचना का सुरक्षित आदान प्रदान करने के लिए यह बहुत अच्छी तकनीक है।